गीत कोई नया गुनगुनाते हैं हम

भीत दुख से कभी भी न खाते हैं हम
इसलिए ही सदा मुस्कुराते हैं हम ।

जब सताती हैं उनकी यादें हमें
गीत कोई नया गुनगुनाते हैं हम ।

दोस्त हम से ही गुलज़ार है अंजुमन
हर लम्हा ख़ुशनुमा ही बनाते हैं हम

ज़िद चली है न कोई किसी की यहां
गम भी मिल कर खुशी से निभाते हैं हम ।

देखी तुमने कहाँ मेरी दरियादिली
बूँद बदले समुंदर लुटाते हैं हम ।

क्या बिसात हादसों की हमें रोक लें
हौसला, हौसलों का बढ़ाते हैं हम ।

-डॉ .रागिनी शर्मा
इंदौर(मध्यप्रदेश)

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