मित्रो! मन का मंथन करना।
स्वयं हृदय की पीड़ा हरना।।
खोज स्वयं की जिसने कर ली।
विजय जगत् पर उसने कर ली।।
लोग कहेंगे बुरा-भला भी।
जाएगा तू कभी छला भी।।
उनके कहने अगर चला भी।
उनके साँचे सदा ढला भी।।
फिर भी सच्चा क्या मानेंगे?
अच्छाई को क्या जानेंगे?
बैर सदा मन में ठानेंगे।
तेरी और अंगुली तानेंगे।।
पर विचार तू मन में करना।
नहीं निराशा अंतस भरना।।
यह जीवन का सत्य तथ्य है।
मन मंथन का उचित पथ्य है।।
-डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ (उत्तर प्रदेश)
