धधकती धरती की साँसों में बारूद की गंध है,
आकाश भी आज जैसे रोता हुआ निर्जन छंद है।
मानवता की आँखों में फिर डर का है अंधकार
इतिहास के पन्नों पर खून का ही है विस्तार ।
दो विश्व युद्धों की राख अभी ठंडी भी ना हुई
कि फिर हवाओं में नफरत की चिनगारी है जली,
कितनी माताओं की गोद उजड़ी, कितने सपने टूटे,
कितने मासूम चेहरों पर आँसू बनकर दर्द हैं फूटे।
नदियाँ भी लाल हुईं, जंगल सिसक-सिसक कर जले,
पंछी बेघर हो गए, पर्वत भी जैसे मौन खड़े ।
धरती की हरियाली को इंसान ने खुद ही लूटा,
अपने ही अस्तित्व पर उसने क्रूर प्रहार है कूटा।
क्या जीत वही, जहाँ जीवन का हर स्वर जाए हार?
क्या शांति वही, जहाँ हर दिल में केवल अत्याचार?
कब समझेगा मानव कि युद्ध नहीं है समाधान,
यह तो बस बढ़ाता है पीड़ा और श्मशान।
आओ फिर से प्रेम के बीज हम मिलकर बोएँ,
घृणा के अंधेरों में उम्मीद के दीप संजोएँ।
क्योंकि हर बम से पहले एक दिल है टूटता,
और हर युद्ध में इंसान ही
सबसे ज्यादा है घुटता।
-डाॅ.दविंदर कौर होरा
इंदौर (म.प्र.)
