वक्त पर कोई नहीं आता
न पत्र आता है
न मित्र आता है
न पुलिस आती है, न आती है एंबुलेंस
अपाइंटमेंट लेटर भी कहां आता है वक्त पर
मौसम तो जाने
कब से खिसका हुआ है
बारिश हो चुकी है ‘बेमौसम की बरसात’
पौधों में फूल, फूलों में फल
की प्रतीक्षा में पथरा जाती हैं आँखें
प्रतीक्षा मत करो मित्र
कहीं जाने, किसी से मिलने की
आतुर उत्कंठा
अब नहीं रही शेष ।
-संतोष कुमार द्विवेदी
