जैसे शराब के प्यालों और
सिगरेट के धुयें के बीच
उलझ के रह गयी थी जैसे
कभी ढूँढता उसे मय के
प्यालों में
तो कभी सिगरेट
के धुएं के छल्लों में
तलाशते-तलाशते आँखें
भी जैसे धुंधला सी गयी,
खाली हो गया सारा मैखाना
और सिगरेट का आखिरी
कश भी,
पर उसकी तलाश
तो बस जहाँ की तहाँ थी,
कि तभी
अचानक कानों में धीरे से कुछ कह गया कोई,
जिसकी तलाश में है तू , वो
यहाँ नहीं तन्हाई में मिलता
है,
डूबना शराब और सिगरेट
में नहीं,
डूबना खुद में पड़ता है,
जैसे मन्त्र कानों में बुदबुदा गया
कोई,
होश में आ गया मैं भी
अनायास ही सही राह दिखा
गया कोई!!!
-सुधीर “धीर”
