खामोशी के पार

शहर की शोर-शराबे भरी गलियों से दूर, पहाड़ी की तलहटी में बना वह पुराना बंगला अक्सर सन्नाटे की चादर ओढ़े रहता था। लोग कहते थे कि वहाँ सन्नाटा ‘रहता’ नहीं, बल्कि ‘बोलता’ है। उस बंगले में रहने वाले मशहूर चित्रकार आर्यमन के लिए यह खामोशी ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी, और सबसे बड़ी कमजोरी भी।

पाँच साल पहले एक हादसे ने आर्यमन से उनकी सुनने और बोलने की शक्ति छीन ली थी। दुनिया के लिए वह ‘खामोश’ हो गए थे, लेकिन उनके भीतर रंगों का एक ऐसा तूफान उमड़ता था जो कागज़ पर उतरने को बेताब रहता था। आर्यमन अपनी कला के जरिए उस दुनिया से बात करते थे जिसे वे अब सुन नहीं सकते थे।
उनकी हर पेंटिंग में एक अजीब सा खालीपन होता था—अधूरी सड़कें, बिना पंखों के परिंदे, या धुंध में लिपटे पहाड़। आलोचक कहते थे कि आर्यमन की कला ‘खामोशी की चीख’ है।
एक शाम, जब आर्यमन अपने कैनवास पर नीले और काले रंगों का मिश्रण कर रहे थे, उन्होंने महसूस किया कि कोई उनके पीछे खड़ा है। उन्होंने मुड़कर देखा—वहाँ मीरा खड़ी थी जो पड़ोस के संगीत विद्यालय में बच्चों को सितार सिखाती थी।
मीरा ने अपनी हथेलियों को जोड़कर अभिवादन किया। उसने एक कागज़ पर लिखा: “आपकी तस्वीरों में खामोशी है, पर उम्मीद नहीं। क्या कभी आपने खामोशी के उस पार झाँकने की कोशिश की है?”
आर्यमन मुस्कुराए और लिख कर जवाब दिया: “खामोशी के उस पार सिर्फ शून्य होता है।”
मीरा हर शाम आने लगी। वह बोलती नहीं थी, बस आर्यमन के पास बैठकर अपना सितार बजाती। आर्यमन उसे सुन नहीं सकते थे, लेकिन वे अपनी मेज पर रखे पानी के गिलास में उठने वाली तरंगों को देख सकते थे। वे सितार के तारों पर थिरकती मीरा की उंगलियों की लय देख सकते थे।
धीरे-धीरे आर्यमन का कैनवास बदलने लगा। काले और नीले रंगों की जगह अब नारंगी, सुनहरा और सुर्ख लाल रंग लेने लगे थे। उन्हें एहसास हुआ कि खामोशी का मतलब ‘अभाव’ नहीं, बल्कि ‘गहराई’ है।
चित्र प्रतियोगिता के दिन आर्यमन ने जब अपनी सबसे बड़ी कृति का अनावरण किया। पेंटिंग का शीर्षक था—”खामोशी के उस पार”।
कैनवास पर कोई शक्ल नहीं थी। वहाँ केवल रंगों का एक ऐसा प्रवाह था जो संगीत की लहरों जैसा दिखता था। दर्शक उसे देखकर दंग रह गए। पेंटिंग को देखते ही ऐसा महसूस होता था जैसे कानों में कोई मधुर संगीत गूँज रहा हो।
एक निर्णायक ने पूछा, “आर्यमन, आपने इस चित्र में ऐसा क्या जादू भरा है कि यह बोलता हुआ प्रतीत होता है?”
आर्यमन ने सांकेतिक भाषा में जवाब दिया, जिसका अनुवाद वहाँ खड़ी मीरा ने किया:
“मैंने आवाज़ों को सुनना बंद किया, तो मैंने धड़कनों को महसूस करना शुरू कर दिया। खामोशी के उस पार शून्य नहीं, बल्कि वह संगीत है जिसे सिर्फ रूह से सुना जा सकता है।”
अक्षमता केवल हमारे दृष्टिकोण में होती है; यदि मन में हौसला हो, तो हम अपनी कमियों को ही अपनी सबसे बड़ी अभिव्यक्ति बना सकते हैं और खामोशी के उस पार जाकर जीवन जी सकते हैं।

-डॉ संगीता बिंदल
पूना (महाराष्ट्र)

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