अम्मा की साड़ी …

उस नीले रंग की रेशमी साड़ी में सुनहरी चमकीली वार्डर इतनी खूबसूरत लगती थी मानो समुद्र ने धूप की ओढ़नी ओढ़ ली हो। जबसे मैंने होश सम्भाला, 
अम्मा की ये नीली साड़ी मुझे हमेशा लुभाती थी।
अम्मा उसे सिर्फ खास अवसरों पर पहनती और फिर से धोकर ,तहा कर अपनी बड़ी सी लोहे की पेटी में रख देती।
जब छुट्टियों में अपनी सहेलियों के साथ खेल -खेल
में हम अम्मा की साड़ियां पहनते तब भी अम्मा की उस साड़ी पर मेरी नजर रहती पर अम्मा की पैनी नजर और पेटी पर लटका बड़ा सा ताला मेरी मंशा
कभी पूरी ना होने देता।
एक बार हमारे स्कूल के वार्षिकोत्सव पर मैंने अम्मा से वो साड़ी पहनने के लिए मांगी पर अम्मा ने एक दूसरी खूबसूरत सी साड़ी मुझे पहना दी। पता नहीं अम्मा को उस साड़ी से इतना लगाव क्यों था? खैर! दिन बीतते गये और मेरी शादी हो गई।
ना जाने कितनी बनारसी, कांजीवरम,सिल्क की साड़ियां मेरे पास आई , गई पर अम्मा की वो नीली साड़ी यदा -कदा याद आ ही जाती।
कई साल यूँ ही बीत गए। इसी बीच बाबूजी भी हम सब को छोड़ कर चले गये। अम्मा अब अकेली ही रह गई। भैया भाभी बीच -बीच में आकर उन्हें देख जाते और जरूरत का सामान दिला जाते। मैं भी कभी-कभी जाकर उनकी खबर ले आती।
पिछले साल अचानक भाभी का फोन आया कि अम्मा की तबीयत ठीक नहीं है। आपको याद कर रहीं हैं। आ जाइए। मैंने फटाफट बैग जमाया और बच्चों के साथ अम्मा के पास पहुंच गई। अम्मा बहुत कमजोर हो गई थी। पर हमे देख कर उनके चेहरे पर रौनक आ गई। तीन चार दिन कैसे निकल
गये, पता ही ना चला। फिर अम्मा से बिदा लेने का दिन आ गया। मन नहीं था पर वापस जाना जरूरी था। दुःखी मन से अम्मा के पास आई और जाने की बात कही। अम्मा ने रोते हुए गले से लगा लिया। फिर एक थैली उठा कर मेरे हाथ में रख दी।
मैंने पूछा “क्या है इसमें “?
बोली    “खुद ही देख ले। “
मैंने थैली खोल कर देखा।उसमे वही अम्मा की पसन्दीदा नीली साड़ी थी। आज भी उतनी ही चमकीली और करीने से रखी हुई। मेरी आँखों में आँसू आ गये। अम्मा भी रोने लगी। बोली  ” ये एक ही निशानी है तेरे बाबूजी की। ये साड़ी वो खुद खरीद कर लाए थे मेरे लिये। पर अब मेरा कोई भरोसा नहीं, कब उनके पास ही चली जाऊँ। “
मैंने बहुत मना किया पर अम्मा नहीं मानी और वो साड़ी मुझे थमा ही दी।
कुछ दिनों बाद ही अम्मा भी हमे छोड़ कर चली गई। अब जब भी अम्मा की याद आती है, मैं वो साड़ी निकाल कर ओढ़ लेती हूँ। मेरे एहसासों में अम्मा आज भी धीरे से आकर बोलती है “सम्भाल कर पहनना, तेरे बाबूजी लाए थे “।

-श्रीमती प्रमिला सक्सेना

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee