राजकुमार कुम्भज की चार कविताऍं.

1.मुॅंह चिढ़ाती हुई धूप

क्या ख़ूब चेहरा है ऑंधियों का
माफ़ी भी माॅंग लें तो कहलाऍं विनम्र
लेकिन वे टहनियाॅं जाऍं तो जाऍं कहाॅं
जो अक़्सर ही टूट जाती हैं टकराते हुए
छूट जाता है सभी कुछ छूट जाता है पीछे
और एक दिन भस्म हो जाता है सभी कुछ
उड़ती रह जाती है सिर्फ़ राख, मिट्टी,धूल
और मुॅंह चिढ़ाती हुई धूप.


2.कितना कमतर हूॅं मैं

कटिबद्ध हूॅं,प्रतिबद्ध हूॅं मैं
अपने ही दु:ख की ओर लौटने के लिए
दु:ख और-और,औरों के सभी भूलते हुए
कौन लिखेगा,कौन समझाएगा मुझे
कितना कायर,कितना कमतर हूॅं मैं
फिर भी लिपिबद्ध हूॅं मैं?


3.सिर्फ़ आभास और स्मरण

याचना में बदल जाती हैं प्रार्थनाऍं
कायरता में बदल जाती हैं विनम्रताऍं
नक़्क़ारख़ानों में क़ैद हो जाती हैं लालटेनें
एक दिन जॅंगल निगल ही लेता है हर गूॅंज
रह जाता है क्षणभर के लिए रह जाता है
समूचे दृश्य-पटल पर झिलझिल- झिलझिल
सिर्फ़ आभास और स्मरण.


4.मुश्किल हैं कविताऍं

मुश्किल हैं कविताऍं
मुश्किल कविताओं का मुश्किल वक़्त है ये
मुश्किल में प्राण हैं,मुश्किल में प्रतिरोध
अन्न-कण दबे हैं अर्से से गरुण के मुॅंह में
भूखे हैं घरों में चिड़िया के बच्चे.


-राजकुमार कुम्भज
इंदौर (मध्यप्रदेश)

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