आगे-पीछे हमको ही समझाने आते हैं,
हम जिनकी आवाज़ उठाने आगे आते हैं।
क़ुदरत का दस्तूर है ये शाखों पे गुलाबो की,
फूल खिलेंगे चार मगर सौ कांटे आते हैं।
ख़ाक में घर जब मिल जाते हैं, देखा है अक्सर,
तब बस्ती में आग बुझाने वाले आते हैं।
वक़्त ज़रूरत उनमें कोई शख़्स नहीं दिखता,
वो जो शोर मचाने सबसे पहले आते हैं।
एक अलग ही ढंग था पहले मिलने वालों का,
अब तो लोग हमेशा हाथ हिलाते आते हैं।
वक़्त पे ख़ुद को साबित करदे वो ही सिकंदर है,
वरना मौके तो जीवन में सबके आते हैं।
पत्थर ही फेंका करते हैं उन पर अक्सर लोग,
जिन पेड़ों की शाखों पर फल मीठे आते हैं।
चैन नहीं लेने देती है कोविड की दहशत,
मजबूरी में बच्चे बाहर जाते आते है।
-अशोक रावत
