मुखौटा:लघुकथा

आज फिर से घर में कोहराम मचेगा ,शाम तक बड़े भईया और भाभी आ रहे हैं।रागनी चाहें कितनी भी तैयारी कर लें हर बार कुछ न कुछ कमी रह ही जाती हैं।भईया भाभी को बहाना मिल जाता हैं उसे सुनाने के लिए।औरतों को घर बाहर दोनों में से एक ही जगह चुननी चाहिए।घर और बाहर के चक्कर में घर तो पूरी तरह से बरबाद हो जाता हैं।रागनी कई बार समझा कर थक चुकी थी कि अब समय बदल गया है औरतें अब दोनों जगहों पर अच्छे से संभालती है बस थोड़ी समझ और समर्थन की जरूरत होती हैं।रागनी के लाखों प्रयास के बाद भी वह जेठ, जेठानी को खुश न कर पायी।
वह आज भी जल्दी से सारा काम निपटाया और ऑफिस चली गई।लौटते वक्त उसे थोड़ी बेचैनी हो रहीं थी पता नहीं भईया भाभी क्या बोले कहीं कुछ बुरा तो नहीं लगा होगा ।यहीं सब सोचते हुए वह घर पहुँच गई।अंदर आ कर देखती हैं भईया भाभी दोनों खुशी से उसके पति से बातें कर रहें हैं और उसको देखते ही भाभी बोली “अरे रागनी आओ मिठाई खाओ मेरी बेटी का बंगलौर के एक बड़ी कम्पनी में नौकरी लग गई ,मैंने बोला था न एक दिन वह हमारा नाम रौशन करेगी ,अब देखना कितने अच्छे रिश्ते आएँगे।
रागनी हस्तप्रभ हो उनका चेहरा देखती रह गई और सोचने लगी वह इतने दिनों से इन्हें खुश करने मे लगीं है जो न जाने कितने चेहरे लगाए घुम रहें हैं। वह उठकर रसोई घर मे खाना बनाने लगी,आज पहली बार उसे अपने आप पर गर्व हो रहा था ।इतने दिनों से वह घर और बाहर दोनों जो बहुत अच्छे से संभालती आ रही हैं।

-शुभ्रा झा

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