घर के आंगन में दीवारें तनी रह गईं
भाई से भाई की दुश्मनी रह गई
फैसला कर लिया, दिल मिले भी मगर
फांस कोई तो दिल में चुभी रह गई
बात मैंने कही दूर तक जा चुकी
बात लेकिन मेरी अनसुनी रह गई
फासले दरमियां इस क़दर बढ़ गए
आसमां से ज़मीं की ठनी रह गई
रात गहरी हुई चांद लौटा नहीं
मां की आंखों में अब तक नमी रह गई
रोज़ मर-मर के ‘केवल’ जिया ज़िंदगी
मौत और ज़िंदगी में ठनी रह गई
-आनंद पाण्डेय “केवल”
