तुम्हारे न होंगे हमारे न होंगे
वो इन्सां जो अपनों के प्यारे न होंगे
ये दिन शादमानी के हैं चंद रोज़ा
हमेशा ये रोशन सितारे न होंगे
ये लम्हे ख़ुशी से बिता दीजिए, फिर
मयस्सर हसीं ये नज़ारे न होंगे
वो है बे-ख़बर ग़म की लज़्ज़त से,जिसने
जुदाई के लम्हे गुज़ारे न होंगे
बदल जाएगी वक़्त के साथ दुनिया
जो अपने हैं वो भी हमारे न होंगे
तिरी ज़िन्दगी में जब आएगी गर्दिश
तिरे साथ में लोग सारे न होंगे
नहीं लुत्फ़ आएगा जीने में जिस दम
नज़र के नज़र से इशारे न होंगे
जो सीखे थे जज़्बों को क़ाबू में रखना
कोई जंग वो लोग हारे न होंगे
ख़ुद अपने ही दम पे बढ़ो आगे जग में
हमेशा मयस्सर सहारे न होंगे
बचो ऐसे लोगों की सोहबत से ‘क़ासिम’
जो तुम्बे हैं वो कैसे खारे न होंगे
-क़ासिम बीकानेरी
