स्मृतियों के पिटारे से,… (जून 2017)

अन्तरा शब्दशक्ति के स्वर्णिम काल की स्मृतियों से निकला यह गीत, वर्ष 2017 में मेरे लिए रचा गया एक अमूल्य भाव-स्मरण है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि उस समय के समर्पण, विश्वास और साहित्य साधना का जीवंत प्रतिबिंब है।
भोपाल के चर्चित गीतकार मनोज जैन जी ने सदैव प्रतिभाओं को प्रेरित किया है और निरंतर साहित्य सेवा के माध्यम से अनेक व्यक्तित्वों को अभिव्यक्ति दी है। अनेक लोगों पर उन्होंने गीत लिखे, किन्तु यह मेरा विशेष सौभाग्य है कि किसी व्यक्ति विशेष पर लिखा गया यह उनका प्रथम गीत है।
अन्तरा शब्दशक्ति को पहचान दिलाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय रहा है। उनके सृजन ने न केवल मंच को स्वर दिया, बल्कि मुझे भी मेरी ही एक नई पहचान से परिचित कराया। वास्तव में, किसी व्यक्ति पर लिखी गई रचना समय के साथ उसका परिचय बन जाती है—और इस गीत ने मुझे मुझसे ही मिलवाने का सुंदर कार्य किया है।
आज यह गीत मेरे लिए केवल एक रचना नहीं, बल्कि उनका स्नेहिल आशीर्वाद और मेरी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बन चुका है। यह मेरे साहित्यिक जीवन की एक ऐसी धरोहर है, जो सदैव प्रेरणा देती रहेगी।
मनोज जी के प्रति हृदय से कृतज्ञता।

डॉ. प्रीति समकित सुराना

नवगीत

आज का तो
नहीं लगता
है बहुत
नाता पुराना

​सुन रही,
प्रीति सुराना।

है अलौकिक
शक्ति तुममें
मैं जहाँ तक
जान पाया।

पूर्णता हर
कर्म को दी
फिर कदम
आगे बढ़ाया।

हो हठीला
कोई कितना
जानती हो
तुम मनाना।

सुन रही,
प्रीति सुराना।

सीखकर
आई कहाँ से
संगठन की
गज़ब क्षमता।

तुम लुटाती
परिजनों पर
रात दिन
निज नेह ममता।

सिद्ध समकित
को हुईं तुम
युद्ध में
जीता खजाना।

सुन रही,
प्रीति सुराना।

भोर के
मधुरिम पलों में
सगुन पाँखी
चहचहाया।

अन्तरा को
सांस देकर
दीप से
सूरज बनाया।

कोई तुमसे
आन सीखे
संकटों में
मुस्कुराना।

सुन रही,
प्रीति सुराना।

-मनोज जैन

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