“पल-पल का चक्कर

(हास्य व्यंग्य)

पल-पल की ये कहानी निराली,
हर पल में जनता हुई है मतवाली।
सुबह का पल कहे “जल्दी उठ जाओ”,
दूसरा पल बोले “थोड़ा और सो जाओ”
पल-पल बदलते हैं हमारे इरादे,
डाइट पर रहकर भी खा जाते समोसे आधे।
एक पल योगा, एक पल जलेबी,
मन बोले“जीवन है, थोड़ी मस्ती भी चलेगी”
मोबाइल का तो पल-पल का साथ,
नहाते वक्त भी नहीं छोड़ता हाथ।
एक पल व्हाट्सएप, दूजे पल रील,
काम का पल आए तो दिल बोले“नो डील”
ऑफिस में पल-पल की घड़ी सताए,
लंच का पल ही बस मुस्कान लाए।
बॉस के सामने सज्जन बन जाए
चाय के पल में गप्पे लगाए।
पति-पत्नी का पल-पल का प्यार,
कभी मीठा, कभी तकरार।
एक पल “तुम सबसे प्यारे
दूसरे पल “बस, करम फूट गए हमारे।
पल-पल यूँ ही निकलते जाएँ,
हम हँसते-हँसते उम्र बिताएँ।
क्योंकि सच यही है, जनाब,
पल-पल में छिपा है जिंदगी का हिसाब।

-ऋतु कोचर,कटंगी

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