(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
मैंने इतिहास पढ़ा,रोम-रोम मेरा खड़ा।
पन्ना पन्ना कहें मुझे,हंसता रहे जहां।
मांओ की गोद उजड़ी,देखी है मौत की लडी।
तभी मिली ये आजादी,हंसता रहे जहां।
बही लहू की नदियां,मुरझा गई कलियां।
मिटा सिंदूर माथे का,हंसता रहे जहां।
जानों वीरों की कुर्बानी,भूल गए वो जवानी।
लगाई जान की बाज़ी,हंसता रहे जहां।
एक हुए सभी धर्म,आजादी ही बनी कर्म।
एकता से हम लडे,हंसता रहे जहां।
देखो तुम वो तिरंगा,हमारे ख़ून से रंगा।
वहीं है सौभाग्य मेरा,हंसता रहे जहां।
उठों बनके चिंगारी,कहे ये मिट्टी हमारी।
खिलती रहूं मैं सदा,हंसता रहे जहां।
मैंने इतिहास पढ़ा,रोम-रोम मेरा खड़ा।
क्रांति नहीं है कहानी,हंसता रहे जहां – –
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर (महाराष्ट्र)
