आज की नारी मजबूर नहीं,
अपने फैसलों की धुरी है।
अपने सपनों की नाव लिए
लहरों से जूझती पूरी है।
साड़ी हो या जींस – स्कर्ट
साहस उसका कम नहीं होता।
कदम बढ़ाए जब मंज़िल को,
कोई रास्ता गुम नहीं होता।
सुबह की किरणों संग जागे
रातों तक मेहनत करती है।
अपने ही हाथों से अपनी
किस्मत की रेखा वह गढ़ती है।
दफ्तर के कामों से उलझती
घर का भी भार उठाती है।
मुस्कान ओढ़े थकी पलकें
फिर भी हिम्मत दिखलाती है।
फिर क्यों कविताओं के भीतर
वह केवल रोती नज़र है आती ?
क्यों शब्दों की तस्वीरों में
बस दुख की छाया सी छा जाती ?
वह आँसू भी है, पर ज्वाला भी,
वह ममता भी है, शक्ति भी।
वह आँधी भी है, दीपक भी,
वह संघर्षों की भक्ति भी।
आज की स्त्री कहानी नई,
अब उसकी पहचान है नई ।
वह अब करुणा की प्रतिमा ही नहीं,
वह साहस की उड़ान है नई ।
अब कविताएँ भी बदलेंगी,
उसकी छवि को सच कहेंगी।
रोती नहीं, वह साहसी स्त्री ,
इक्कीसवीं सदी की “ऐ दविंदर “
वह नारी है।
-डॉ. दविंदर कौर होरा
इंदौर (म.प्र.)
