शहर से लौटकर, जब गाँव की तरफ आया, तो भीतर वही बचपन की स्मृतियों ने कल्पना के गोतों में कहीं खो-सा दिया था। एकाएक, संकरी गलियों की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर पहले जैसा नियंत्रण भी अब पूरी तरह से अनुभवहीन हो चुका था। आस-पास की किलकारियों में वो पहले जैसा गाँव दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा था। दुपहरी के समय छाँव देने वाले वृक्ष, समय के चक्र में कहीं धूमिल हो गए थे। भूतकाल को निगलने वाला यह वर्तमान, अभी समक्ष एक अपरिचित-सा जान पड़ रहा था। लगभग 16 वर्ष के बाद, अपनी ही ज़मीन इतनी बदल गयी है, आँखों पर विश्वास नहीं होता, किंतु यही शाश्वत सत्य भी है। परिवर्तन ही तो इस संसार का अटल नियम है।
अपने दोनों भौहों को तानते हुए, शरण अभी भी अपनी गर्दन घुमाते हुए, एक-एक दृश्य को बड़ी सूक्ष्मता से देख रहा था। शायद कुछ छूट गया हो उससे। मुख्य सड़क से पैदल चलते-चलते, माथे पर उभरे पसीने को पोंछने की सुध भी खो-सा बैठा था, और चेहरे की गंभीरता मानो यह दर्शा रही थी कि वह अपने अंतिम गंतव्य की तरफ हर हाल में पहुँचना चाहता हो। जिस अंतिम संकरी गली से वो रास्ता उसके घर की तरफ जाता था, शरण उससे बिल्कुल दूसरी दिशा की तरफ चल पड़ा था। कहीं-कहीं पर आंगन के चौखट में बैठे बड़े बुजुर्ग, पेड़ों की छाँव में पड़े सुस्ता रहे थे, किंतु कहीं पर भी भरा हुआ जत्था एक साथ बैठा दिखाई नहीं पड़ रहा था।
हमउम्र के मित्र शायद अब गाँव में नहीं थे, और जो पहले छोटे बच्चे थे, वे अब गाँव के प्रमुख बन चुके थे। बदलाव के इस माहौल में केवल लोग ही नहीं, पूरे गाँव का परिसर भी लगभग बदल चुका था। जो रास्ते खुले मैदानों की तरफ जाते थे, वहाँ कुछ ऊँचे भवन, अपनी काँच की खिड़कियों की आँखों से सूर्य के तेज को अपने भीतर ग्रहण करते दिखाई पड़ रहे थे। दोपहर के समय, इस भीषण गर्मी ने पूरे इलाके में एक शांत वातावरण निर्मित कर रखा था। लू की यह उठती चिंगारी, अपने पूरे भयावह रूप में उपस्थित थी।
अपनी ही अतीत की स्मृतियों में चलने का हर्ष, धूप की तपिश किरणों में भी शरण का हौसला दोगुना बढ़ा ही रहा था। पुराने जीर्ण-शीर्ण, टूटे-फूटे घरों के आसपास, गौशाला, अस्तबल और पशुओं के रहने के स्थान, मकान के पिछले भागों में स्थानांतरित हो चुके थे; इसलिए कभी-कभी दबी हुई ध्वनि, चित्त को वहीं पुराने बीते युग का स्मरण करा रही थीं।
अपने घर में जाने की लालसा से बढ़कर, कुछ और भी था, जो अभी शरण को पूरी तरह से अपने मोह-जाल में जकड़े हुए था। युवक देह में, कहीं-न-कहीं बचपन की स्मृतियाँ, आज इतने लंबे समय के बाद सक्रिय हो चुकी थीं। किन्तु अभी भी इस रहस्य का पूर्ण उजागर, अपने रहस्य को पूरी तरह सुरक्षित अपने भीतर टिकाए हुए था। इस अभेद्य रहस्य का कवच, समय के शिलालेख से दूर, धीरे-धीरे अपने पुनरुत्थान की तरफ बढ़ रहा था। हर बढ़ते कदम पर, वह पिछले 20-25 वर्ष पुराने बाल्यकाल की ओर बढ़ता जा रहा था। निरंतर खोजी प्रवृत्ति की चमक, उसकी आँखों में बहुत सजीव चित्रण करती हुई प्रतीत हो रही थी।
चलते-चलते, सुडौल बदन का युवक, बिना प्यास-भूख के आखिर उस जगह पहुँच ही गया। किन्तु ऐसा चित्रण, जो उसकी आँखों में छवि बनकर कई वर्षों से पल रहा था, उसका अस्तित्व उस स्थान से मिट चुका था। अपने नाखूनों को चबाते और हड़बड़ाते हुए, वह वात्सल्य से दूर, वहीं उस सूखे हुए पेड़ के नीचे बैठ गया। ज्येष्ठ की गर्मी ने अब उसे थोड़ा-सा मुरझा-सा दिया था। अपने आत्मविश्वास का गला घुटने से पहले, उसने अपनी पीठ पर लदे बैग से पानी की कुछ बूंदों को पीकर, शेष पानी अपने चेहरे पर उड़ा दिया, और कुछ क्षण आँखें बंद करके, उसी मुद्रा में एक पाषाण-मूर्ति-सा खड़ा रह गया। तभी पास ही से गुजरते हुए हलवाई की नज़र शरण पर पड़ी, और ऐसा लगा कि इस विरक्त कड़ी की कुछ श्रृंखला, अभी फिर से नए सिरे से अपने उसी रिक्तता को भरने के भरसक प्रयास में जुड़ चुकी है।
किसी तरह, इस विरह-वेदना का अंत अभी नष्ट होने के कगार पर आ पहुँचा था।
हलवाई श्यामाचरण ने उसे आवाज़ लगाते हुए कहा कि, “कौन गाँव जाना चाह रहे हो, बाबू?” प्रश्न पूछने के बाद, हलवाई अपने मन में उसके प्रत्युत्तर का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार करता रहा।
शरण अपने दोनों हाथों से आँखों को मसलते हुए, उठती ध्वनि की दिशा की तरफ घूम गया, और बिना समय गंवाए, अपने भीतर उठ रहे प्रश्न को हलवाई के समक्ष प्रकट कर बैठा।
सिर खुजलाते हुए, और अपनी आँखों को गोल घुमाते-घुमाते, संदेह की नज़र से वह एकटक सोचता रहा, और कुछ याद आते ही तपाक से बोल पड़ा, “बाबू, ये तो बहुत पहले की बात रही। उसे यह सब छोड़े तो बहुत समय बीत गया।”
बात पूरी होने के पहले ही, शरण बीच में बोल पड़ा, “क्या पता चल पाएगा, अभी इस समय, वो पतंगवाले चाचा कहाँ हैं?”
हलवाई के चेहरे पर दबी मुस्कान, शरण के आत्मविश्वास को और बढ़ाती जा रही थी। किसी बिछोह के बाद मिलन का जो परमसुख प्राप्त होता है, वो आज शरण के चेहरे और व्यक्तित्व में साफ झलक रहा था, जबकि अभी तक हलवाई ने कुछ कहा तक नहीं था; किन्तु यही तो आत्मा की आवाज़ होती है। इंसान अपनी चाह को प्राप्त करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देता है। हलवाई मूँछों को ताव देते हुए फिर कहने लगा, “वह यहीं पास वाले मंदिर के बाहर पड़ा रहता है। पेट भर खाने का प्रबंध मंदिर कर्मचारियों से पा जाता है, बस यही गुज़र है उसका। कर्म का सिद्धांत आज उसे किसी के आसरे पर ले आया।”
इतना कथन पूर्ण होते ही, शरण अब पहले की भाँति चलना छोड़, सीधे मंदिर की दिशा की तरफ दौड़ पड़ा। पास पहुँचते ही, मंदिर में बजने वाली घंटियों का मंद स्वर अभी स्पष्ट सुना जा सकता था। मंदिर के दायीं तरफ, उसने गंदे कपड़ों से लिपटे हुए वृद्ध व्यक्ति को देख लिया। मंदिर का गर्भगृह, दोपहर की कड़कती धूप की वजह से रिक्त था, किंतु उस वीरानता में भी शरण के भीतर का शोर बड़ी तीव्रता से उमड़ पड़ा। अपनी चाल और मानसिकता के बीच इस द्वंद्व को, अभी वह पूरी तरह से समाप्त करने के अंतिम चरण में पहुँच चुका था।
बिना किसी झिझक के हाथ लगाते हुए, शरण पुकार उठा—”चाचा, ये मैं क्या देख रहा हूँ?”
वह वृद्ध व्यक्ति कुछ समझ पाता, इससे पहले शरण उसके पैरों के पास जाकर बैठ गया।
फिर से वही प्रश्न के साथ, शरण पूछ बैठा, “चाचा, ये क्या हाल बनाए हुए हो?”
चाचा की सफ़ेद दाढ़ी और उसके भोलेपन चेहरे की छवि, अभी भी शरण के हृदय में सटीक बनी हुई थी; इसलिए बिना संदेह, वह उन्हें पहचानने में किसी प्रकार की भूल नहीं कर सकता था।
अचरज आँखों से, वृद्ध व्यक्ति अभी भी शरण को ठीक से पहचान नहीं पा रहा था। अपना इतिहास, अतीत की गोद में वह कब का बहा चुका था; इसलिए उन स्मरणों को अपने भीतर खोज पाना असंभव-सा लग रहा था। किंतु शरण की मासूमियत और स्नेह से, एक बार फिर उसे उस पिछले बीते हुए प्रसंगों को याद आने के लिए विवश होना पड़ा। प्रेम की यह शक्ति है कि वह अपने सामर्थ्य पर, मोह को चेतना में छिपे ब्रह्मांड से भी वापस जाग्रत कर सकता है।
एक बार फिर शरण ने कहा, “आपने क्यों पतंग बेचना छोड़ दिया था? क्या अब छोटे बच्चे गुब्बारे-पतंग खेलने की ज़िद नहीं करते, बताओ चाचाजी?”
“हाँ, बेटे, अभी कोई पतंग खेलने की ज़िद नहीं करता। अब समय बदल गया है। मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, और अभी मुझमें ऐसी फुर्ती नहीं रही कि मैं बालकों के साथ फिर से बच्चा हो जाऊँ। तुम भी तो कितने बड़े हो गए हो।”
“बेटा शरण, यह सब समय का चक्र है। अभी सब कुछ बदल गया है। दुख इस बात का है कि मैं दूसरों के टुकड़ों पर पल रहा हूँ, और खुशी की बात यह है कि तुम अभी भी नहीं बदले। तुम्हारे अंदर का बालक, तुमने इतने वर्षों के बाद भी ज़िंदा रखा है। तुम्हारे आदर्श को मैं नमन करता हूँ, बच्चा।”
“कैसे ज़िंदा नहीं रहता, चाचाजी!” अपना मुँह रुमाल से पोछते हुए, शरण ने कहा, “आप ही ने तो मुझे पतंग उड़ाना सिखाया, और आप हमेशा कहते थे कि अपनी काबिलियत से, मेरे बच्चों, तुम हमेशा आकाश छूना।”
“चाचाजी, हमने आकाश तो छू लिया, मगर आपको ज़मीन में रखा हुआ पाया।”
“नहीं, बेटे! यह तुम्हारी जिम्मेदारी नहीं थी। वो मेरा रोजगार था, इसलिए बस…”
“अच्छा, बेटे, तुम्हारे घर में सब ठीक है?” अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए, बुजुर्ग व्यक्ति बात पलटने के लिए पूछने लगा। वृद्ध व्यक्ति के देह में धूल भरी हुई पुरानी पोशाक, धीरे-धीरे मटमैली हो चुकी थी। आस-पास, अलग-अलग वस्तुओं के टूटे-फूटे अंश बिखरे पड़े हुए थे। सफेद दाढ़ी के बीचों-बीच, चेहरे का कान्तिमय क्षीण हो चुका था, और झुर्रियों भरी देह में केवल एक आत्मा टिकी हुई थी, जो अपनी अग्नि की क्षुब्ध भूख को मिटाने के लिए, इस जर्जर अवस्था में, एक द्वंद्व के लिए कई बार मृत्यु से जीत चुकी थी। कर्मठ के सिद्धांत पर, जो छवि कुछ साल पहले नज़र आती थी, आज इस वर्तमान ने उस भरम से निकालकर, शरण के हृदय को द्रवित कर दिया था। उमड़ते आँसू, ज़मीन पर टपकते, फिर देर नहीं लगी। अब आगे कुछ देर तक, उसकी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। शब्द मुँह तक आते, और फिर भीतर ही किसी गहरी गुफा में खो जाते। हिचकते हुए आँसुओं से विह्वल प्रेम का रस, इंसानियत की जीत को साफ-साफ दर्शा रहा था।
वृद्ध व्यक्ति थोड़ा-सा उठकर बैठते हुए, अपना हृदय मज़बूत करते हुए बोला—”रो मत, बाबू! तू क्यों रोता है? तेरे पास तो सब कुछ है। तुझे हमेशा आगे-आगे बढ़ना है। तू क्यों अपनी खुशी में विघ्न पैदा करता है? यह तो नियति का चक्र है, जो आरंभ है तो अंत भी अवश्य है। मैं तो जीवन भर, पतंग की तरह, हमेशा उड़ता रहा हूँ, तुम जैसे बच्चों के प्रेम में। अब थक चुका हूँ, इसलिए ज़मीन पर पड़ा हूँ। तू अपना दिल छोटा मत कर, बच्चा।”
शरण अपने आँसुओं को पोंछने के बजाय, प्रश्न पर प्रश्न पूछता रहा। दोनों के बीच का संवाद, इंसानियत के इस आदर्श पर टिका रहा, और गुफ्तगू समाप्त ही न हो सकी।
एक बार फिर, शरण ने कहा, “चाचाजी! जब मैं और हमारे दोस्त चले गए थे, तब आपने दूसरे छोटे बच्चों के लिए पतंग बेचना क्यों जारी नहीं रखा?”
धीरे-धीरे, अपने सभी प्रश्नों का उत्तर वृद्ध व्यक्ति देता रहा, और इस प्रश्न के उत्तर में, वह कुछ क्षण चुप रहा। फिर आँसुओं के मोह ने भी आखिर उसे द्रवित कर ही दिया, और इस बार निकलते हुए, इन अश्रुओं को बिना पोंछे ही, वह कहने लगा कि, “मैंने बहुत प्रयास किया, बच्चा, पर समय बदल गया था। सभी नयी-नयी मनोरंजन की वस्तुओं ने धीरे-धीरे पतंगों के पर काट दिए, और किसी को भी इसमें कोई विशेष रुचि नहीं रही। सब कुछ काल के ग्रास में लुप्त होता रहा। यह गाँव कब शहर में बदल गया, पता ही नहीं चला। मुझे पता नहीं चला, बच्चा! सब कुछ बदल गया।”
वृद्ध व्यक्ति से हाथ जोड़कर, शरण ने फिर उसी प्रेम से कहा कि, “मुझे आज फिर से पतंग उड़ानी है, और मैं अब हमेशा के ही लिए यहाँ के नजदीकी शहर में आ गया हूँ, और सप्ताह में एक बार आता-जाता रहूँगा। मैं फिर से आपको वहीं ले जाकर, पतंग उड़ाने के लिए आते-जाते रहूँगा।”
आँसू पोंछते हुए, दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हुए खड़े हुए, और आकाश की तरफ देखने लगे, और शरण ने वृद्ध व्यक्ति को गले लगा लिया। आसमान साक्षी होते हुए, इस प्रेम का आनंद-रस लेने में तल्लीन हुआ, और तभी एकाएक, आसमान में बहुत दूर, एक पतंग उड़ती दिखाई दी।
-ललितप्रसाद मथुरादत्त जोशी
छत्रपति संभाजीनगर (महाराष्ट्र)
