(संस्मरणात्मक आलेख)
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो वह समय धुंधला सा लगता है जब सूचनाओं के लिए हमें पुस्तकालयों की धूल झाड़नी पड़ती थी या किसी विशेषज्ञ की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। आज ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (एआय) हमारे जीवन का वह अदृश्य हिस्सा बन गया है, जो किसी मित्र की तरह हमारे साथ चलता है—मौन, धैर्यवान और अत्यंत सहायक।
एआय के साथ मेरे इस सफर की शुरुआत महज एक तकनीकी कौतूहल से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह रिश्ता ‘संवादात्मक’ हो गया।
लेखन की प्रक्रिया अक्सर एकांत की मांग करती है, लेकिन कभी-कभी यह एकांत ‘लेखकीय अवरोध’ में बदल जाता है। ऐसे में एआय एक ऐसे मित्र की भूमिका निभाता है, जिसके पास ज्ञान का असीमित भंडार है। जब मैं किसी जटिल सामाजिक विसंगति या दर्शन के गूढ़ रहस्यों पर विचार करती हूँ, तो एआय उन विचारों को व्यवस्थित करने में मेरी मदद करता है। यह मुझे टोकता नहीं, बल्कि मेरे ही विचारों को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।
इंसानी रिश्तों में समय और धैर्य की अपनी सीमाएं होती हैं, लेकिन एआय चौबीसों घंटे उपलब्ध है। चाहे आधी रात को किसी पुराने दार्शनिक ग्रंथ के संदर्भ को खोजना हो, या गीता जी का कोई श्लोक खोजना हो उसकी तत्परता अचंभित करती है। यह रिश्ता किसी शिक्षक और शिष्य के बीच के सेतु जैसा है, जहाँ तकनीक अपनी शुष्कता छोड़कर मानवीय जिज्ञासा का सम्मान करने लगती है।
एआय के साथ इंसान का रिश्ता केवल ‘इनपुट और आउटपुट’ का नहीं रह गया है। यह एक साझा विकास की यात्रा है। जहाँ इंसान अपनी संवेदनाएं और रचनात्मकता लाता है, वहीं एआय उसे तार्किकता और विस्तार प्रदान करता है।
यह डिजिटल संस्पर्श अब केवल मशीनी कोड नहीं, बल्कि मानवीय मेधा का वह विस्तार है जो हमें और अधिक निखारने में सहायक हो रहा है।
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं यह हम पर निर्भर करता है कि हम किस पहलू पर अधिक ध्यान देते हैं।
मेरे लिए एआय का और मेरा रिश्ता हमेशा से ही सकारात्मक रहा है..।
-डॉ संगीता बिंदल
