बीनू का फोन मम्मी ने उठाया और बोला, ” बोल बेटा, सब ठीक है ना!”
“मम्मी, यहाँ हॉस्टल में अच्छा नहीं लग रहा है, यहाँ खाना भी अच्छा नहीं मिलता।”, बीनू की भरभराई आवाज आई।
“बेटा, कुछ दिन बाद अच्छा लगने लगेगा, घर और बाहर में यही तो अंतर होता है, अगर यहीं कहीं पास में स्कूल होता है हम तुझे इतनी दूर क्यों भेजते।”, जानकी ने समझाते हुए।
“मम्मी, आपकी याद बहुत आती है।”
“हाँ बेटा, आती होगी, मम्मी तुम्हारे साथ ही है, तुम हिम्मत मत हारना, जीवन में पढ़ाई ही सब कुछ है, बिना पढ़ा लिखा आदमी पशु समान है। राम लक्ष्मण और कृष्ण को भी बाहर पढ़ने जाना पड़ा था।”, जानकी ने फिर समझाया।
“जी, मम्मी जी, मैं भी खूब पढ़ूंगी और अधिकारी बनूंगी “, बीनू बोली।
“बहुत अच्छी बात, खूब मन लगा कर पढ़ो, मैं और पापा तुम्हारे पास आते जाते रहेंगे। तुम किसी तरह की चिंता मत करना, कोई परेशानी हो तो तुरंत बताना”, रजनी ने फिर समझाते हुए कहा।
“जी, मम्मी जी।” बीनू ने फोन काटते हुए कैंटीन में खाना खाने चली गई।।
-डॉ. जय प्रकाश प्रजापति ‘अंकुश कानपुरी’
