कभी तो मिलो ना साजन
कहीं भी…..
झील के किनारे
शिशिर के तरंगी मौसम में….
भरी दोपहरी
फागुन की ठंडी बयार में…..
गुलमोहर से महकती फिज़ाओं में
रंगों के त्यौहार पर
होली के दिन…..
मुलाक़ात तो होगी ना साजन…….
याद है तुम्हें….
बरसों पहले……
होली का वो दिन
जो मेरे जीवन की पहली होली थी
और रंगों से भूत बनना
मुझे कतई पसंद नहीं था
बहुत डरती थी मैं
लेकिन तुम
और तुम्हारे साथी
कैसे हाईजैक कर
मुझे झील के किनारे ले गये
फ़िर तुमने मुझे रंगों में यूं सराबोर किया
कि गुलाल से भरे
तुम्हारे हाथों का स्पर्श
मुझे अन्दर तक रोमांचित कर गया
उस दिन झील के पानी में
अपनी छवि देखी
तो पता चला कि होली में
भूत बनना भी कितना सुंदर होता है….
आओ ना…
आज फ़िर मुझे
रंगों से सराबोर कर दो
कहीं तो मिलो ना साजन
अपने प्यार के रंग से मुझे
फ़िर से रंग दो!!
-प्रो. ( डॉ.) मंजू वर्मा,
रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़
