आधार, विधाता छंद
1222,1222,1222,1222
मिला जो और भी मिलता, ससुर बारीक ना होता।
खुशी मिलती कहाॅं ऐसी,खुदा तौफीक ना होता।
सड़क पर माल जूतों की उसे पहनाइ ना जाती,
कहीं से आचरण उसका अभी तक ठीक ना होता।
कभी का छोड़ता पीछे मुनब्बर और राहत को,
कहीं उर्दू के लहजे में अगर मैं वीक ना होता।
नहीं संयम कभी डिगता न मैं बदनाम ही होता,
मिरे घर से तिरा रहना कहीं नजदीक ना होता।
अभी तक नौकरी से वो कभी का लग गया होता,
हुआ जो टैस्ट में पेपर, कहीं से लीक ना होता।
-गुरु सक्सेना
