वो चंद बरसों का साथ अपना
बड़ा ही गहरा वो एक सपना
भले वो अपने मकां में रहती
भले मैं अपने जहाँ में रहता
मगर वो हर पल करीब मेरे
लहू के जैसा रगो में बहती
वो रूह बनकर बदन में रहती
अगर मैं उसकी मिसाल ढूँढूँ
तो सारी दुनिया ग़रीब निकले
वो आगरा की थी संगमरमर
कि जिसपर अक्सर फिसलती है नज़र
वो पाक उजली सफेद हर्फ़े
वो जैसे ‘शिमला’ की ताज़ा बर्फें
वो जैसे ‘काशी’ की इक सुबह हो
नदी के तट पर सुकून का वन
वो जैसे ‘मैसूर’ का हो चंदन
महकती जिससे हवा ए-जंगल
वो जैसे ‘केरल’ के जल की कल कल
नज़ारा जिसका सुकून देता
कि बात करना जुनून देता।
-आनंद राज सिंह
