कब मिले बिछड़े, हमें कुछ याद आता ही नहीं
अब गिला भी क्या करें, जब कोई नाता ही नहीं
पत्थरों के घर में रहकर लोग पत्थर हो गये,
सिर्फ दीवारें हैं, आँगन रास आता ही नहीं
टीवी इंटननेट ने अब मसरूफ़ इतना कर दिया,
अपने पन के गीत कोई मीत गाता ही नहीं
खो गये बच्चे मेरे जाकर शहर की भीड़ में,
डाकिया भी ख़त मेरे बच्चो के लाता ही नहीं
चंद सिक्को के लिए, मत अपनी ग़ैरत बेचिए,
न कफ़न में जेब, और ऊपर तो खाता ही नहीं
-शीतल वाजपेयी
