लाल सुर्ख जोड़े
में लिपटकर ,
ससुराल की देहली
से जो मिलने आई।
न जाने कितने
रिश्तों को छोड़ा,
कितनो को सजोने आई।
माँ ने बिदाई की तू पराई है,
सासू ने स्वागत क़िया कहा
तू पराए घर से आई है
फैसलों में ये दुहाई दी।
खड़ी खड़ी अपने मेहँदी लगे,
उन हाथो को देखा मैंने।
भाग्य की वे लकीरे भी,
नजर आई नही मुझको।
अब लकीरे खुद ही ,
बनाना होगी।
अपना घर कह सकूँ ,
उसको ऐसा बनाना होगा।
दो बुँदे जो गालो पे ,
लुढक आयी थी मेरे ।
किसी के स्पर्श से ,
नीचे आने से बची।
मेरा हाथ जो थामा ,
सपनो को सजाने में,
इसी लीये हर रोज मै,
सपने देखती हूँ मेरे दोस्त।
दोस्ती की कीमत जानती,
हूँऔर निभाती हूँ हर रोज।।
-हेमा पाण्डेय
