प्रेम

प्रेम की कोई सीमा नहीं थी मगर,
शब्द स्वर में कभी भी नहीं ढल सके ।
बारिशों ने हृदय पर दी दस्तक मगर,
जो थे कागज अहम के नहीं गल सके ।।

मुस्कुराती हुई एक विरहन लगी।
अपनी साँसो तलक से भी अनबन लगी।
फेर ली जब निगाहें मुझे देखकर,
वो घड़ी पूरे जीवन का क्रंदन लगी।

पुण्य यूँ तो किया हर जनम ही मगर,
फिर भी प्रारब्ध मुझको नहीं फल सके ।।

आत्मा खालीपन में भटकती रही।
ज़िन्दगी हौले हौले सरकती रही।
तुमने जो मौन उपहार में दे दिया ,
मैं वही शोर गीतों में लिखती रही।

पत्र इक इक जलाया तुम्हारा मग़र
भाव के पृष्ठ अब तक नहीँ जल सके

देखती तुझको अब भी है ऑंखें मेरी,
ढूंढतीं मुझको अब भी है राहें तेरी ।
तुमने जो भी कहा मैंने जो भी सुना
मन पे अब तक लिखी है वो बातें तेरी ।।

प्रेम का पंथ दोनों ने चुन तो लिया,
हम नहीं चल सके तुम नहीं चल सके ।।

-गीतू महेशवरी

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