नारी को कब समझा इंसान

हर घर की यही कहानी है
हर घर की अपनी गरिमा है,
हर सास नहीं मां बन सकती
ना हर बेटी पर मां की महिमा हो।

अंदाजे-बयां कुछ ऐसा है जगत
सुनी सुनाई सब पर लगा दिया,
जिस पर बीती उस पर ही
तोहमत का तमगा सजा दिया।

सब धुले दूध के बन जाते
शकलों पर उनकी मत जाना,
बस उनका सुकून ये होता है
औरत का घायल हो जाना।

बेटी सहती जब जलना मरना
तब सोये खुर्राटे भरकर तुम,
एकाध अगर जागी महिला
जीना भी लगता तुमको भ्रम।

क्या औरत बिन आत्मा की है
क्या उसको दर्द नहीं होता,
इंसान उसे कब समझा तमने
क्या प्यार में मर्द नहीं होता।

कुचला धोया पटका-झटका
कितना भी तड़पाया तुमने,
मर्यादा उसकी अडिग रही
चाहे फांसी पर लटकाया तुमने।

आया है समझ या अब भी नहीं
क्या सहनशीलता होती है,
तुमने हाथ पकड़ भी छोड़ दिया
वो छोड़ी भी बच्चों में जी लेती है।

फिर भी तुम्हारा जी भरा नहीं
उसकी आजादी रास न आई तुम्हें
उसने तुमको सिखाने की ठानी
औकात की याद दिलाई तुम्हें।

पिटती कुटती लुटती जीवन भर
फिर मरने पर दुजी ले आते हो,
उसपर ही इतना बंधन क्यों
तुम मर्द बने इतराते हो।

तुम मरते सारा जीवन अपना
तुम्हारे नाम ही खपा दिया,
नन्हें बच्चे तुम देकर जो गये
तुम्हारे नाम से उनको जवां किया।

फिर बड़े हुए उनने भी आखिर में
माँ को ही किनारा दिखलाया,
पापा के नाम का टैग उसी ने
माथे था तुम्हारे चिपकाया।

धरती पर अंकुर फूटकर भी
फसल किसान की बन लाती,
हरी भरी कर धरती जो सहती
वो फसल बीज की कहलाती।

कब समझोगे उसे अपना पूरक
आधी अपनी गृहस्वामिनी उसे,
गर उसने अपना हक मांग लिया
कहने लगे कलंकिनी कुलटा उसे।

जीने ना दिया किसी भी तरह
तब क्या करती खड्ग उठा ली है,
अपने हर आँसू का गिन गिनकर
बदला लेने का बिगुल बजा ली है।

चाहे देर सही या सवेर सही
जो बो ओगे वो ही काटोगे,
जहाँ बोया पेड़ बबूल का हो,
वहाँ आम कहाँ से छांटोगे।

तैयार रहो मानव बनने को
मर्दों वाला चोला उतारो अब
नर -नारी पूरक बनकर दोनों
इंसानियत की तस्वीर संवारो अब।

सृष्टि का नियम परिवर्तन है
इतिहास यहाँ दोहराता है,
अपना किया घूम-फिर एक दिन
फिर अपने सामने आता है।

तो थामो हाथ उस देवी का
गाथा दिन-रात जो गाते हो,
बनकर शिव सती को लेकर
जो परम पिता कहलाते हो।

-किरण मोर
कटनी

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