ज़ंजीर-ए-इश्क़ पाँव में डाली गई हुज़ूर।
चाहा बहुत मगर न निकाली गई हुज़ूर।
हँस हँस के प्यार से यूँ मेरी जान माँग ली
हमसे न उनकी बात भी टाली गई हुज़ूर
आज़ादियों की बात करें भी तो क्या करें
आदत हमें ग़ुलामी की डाली गई हुज़ूर।
यादों से उनकी भर गई हवेलियाँ मेरी
पर ख़्वाहिश-ए-दीदार तो ख़ाली गई हुज़ूर।
अब तक बचा हुआ था मैं तीर-ए-निगाह से
इस बार सर से मौत न टाली गई हुज़ूर।
दीदार-ए-यार से भी मुकम्मल हुआ हूँ आज
बरसों से थी तमन्ना जो पाली गई हुज़ूर।
‘मिंटू’ का इश्क़ देखिए कैसा अजीब है
हँस-हँस के बात दिल की छुपा ली गई हुज़ूर।
-डॉ॰ बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’
सम्प्रति – अध्यापक , बिड़ला पब्लिक स्कूल , दोहा -क़तर
