“सोना – कनक – स्वर्ण”
सोने की चमक ने ,किस्मत चाँदी की चमकाई ।
अच्छे अच्छों की कमर तोड़ी हकीक़त सामने आई
जो खरीद रखा था ,जमाने के डर से पहन न पाई ।
बेरोजगारी और मंहगाई ने लूट पाट ऐसी मचाई ।
भाव इतना न बढाओ की न मिले कोई कद्र दान ।
ऐठों इतना ही खुलो तो मिल सके फिर वही सम्मान ।
लोहे पीतल ही नहीं चमक रखे सोने की चमक पड जाती है फीकी ।
मुंह में हों छाले गर तो मिर्च हद से ज्यादा लगती तीखी ।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
