“उम्रें लगीं कहने में जिसे, वो बस दो लफ्जों की इक बात थी,
मगर उन लफ्जों के पीछे, जज़्बातों की पूरी कायनात थी।
वो जो दिन गुजरा था मेरा, मानो सदियां जैसे बीत गई,
हर लम्हा एक युग बना, ऐसी उस दिन की बिसात थी।
सूरज भी जैसे ठहर गया, उस एक दिन की दहलीज़ पर,
वो एक दिन सौ साल का, और सौ साल की वो रात थी।
घड़ियाँ भी थक कर सो गईं, वक्त का पहिया थम गया,
खामोशियों के शोर में, डूबी हुई हमारी हर मुलाक़ात थी।
तन्हाई की उस आग में, जलता रहा मेरा वजूद जैसे,
जैसे किसी पुराने शहर की, वो आखिरी सी रात थी।
कहने को तो बस दो शब्द थे, चाहते तो कह सकते थे,
पर उस एक पल में सिमटी हुई, जैसे पूरी मेरी हयात थी।”
-डॉ मंजू तिवारी
