नग शृंग सुंदरी सुरीली,
आंचल ओढ़े अंग जाह्नवी।
नील नभ नीचे खड़ी खड़ी,
बाट जोहे नर शृंग सुंदरी।
धनक निहार रहा सुंदरी ।
नीर क्षीर की बूंद पड़े जब,
भीगे मन श्रृंगार सुंदरी ।
मृगनयनी नैन घन करे कजरा ,।
चंद रश्मि चंचल आनन पर,
सुंदरी छटा छवि छलक रही।
सतरंगी बाहें धनक रही पसार।
आजानुबाहों में करती रहो तुम,
नित नित नये नये श्रृंगार।
देख छवि रजनी में चंदा जागे,
ओर जागे तारे दीप हजार।
हे शिव सुनो स्पंदन मेरा,
जहां बहे सरिता की धार।
कदम कदम पर ताड़,लताएं,
सोएं नीली चादर तान।
मन हर्षित हो जाता मेरा,
पवन बहे मलय की शान।
फूल पत्ती सब झूमे नाचे,
पाकर प्रिय वर्षा का प्यार।
घनघोर घटा घन वर्षा होती,
झरने बहे उरोज की धार।
कानन कानन भटकत भटकत,
नित खोजे अपना शृंगार।
कहे शृंग नग धन्य हुई अब,
पाकर यह सुंदर संसार।
चंचल चपल चितचोर हरि मन,
मुखचंद शृंग सुंदरी निहार रहा।
हर्ष से हर्षित मनमोहन,
मन मुरली मधुर बजा रहा।
शेरसिंह ढ़िकवाल ‘घायल’
पचेरी बड़ी झुंझुनूं (राजस्थान)
