“मिलना चाहा“

तुम्हारी क़सम जब भी तुमसे मिलना चाहा!!
कभी तुम ना मिले , कभी वक़्त ना मिला ।

जब भी निकला सकूँ की तलाश में
तब ना मंज़िल मिली ना तू मिला ।

ना आराम मिला ना चैन मिला
बस बेचैनी का एक भंडार मिला ।

जब मरना भी चाहा, ना धड़कन ही रुकी,
ना सांस रुकी, बस ज़ख्मों का दर्द बढ़ा ।

क्या समझोगे मेरी खामोशी
जो अल्फ़ाजों को पढ़ ना सका ।

जब लिखना चाह तो कभी काग़ज़ ना मिला कभी अल्फ़ाज़ ना मिले ।

कभी लिखा भी तो वो आँसुओं से मिटा मिला !!

सुकूँ की तलाश में कभी हम ना मिले कभी वो ना मिला ।

तुम्हारी क़सम जब भी मिलना चाहा तुमसे !!
कभी तुम ना मिले , कभी वक़्त ना मिला ।

-प्रवीण अरोड़ा

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