दौर ये साजिशो का हैं देश को बाँटने का है,
घृणित राजनीति का है,जाति,धर्म वाद का हैं।
मानवता के ह्रास का हैं,समाज तोड़ने का हैं,
जहर घोलने का हैं, मुखौटे पहनने का हैं।
राजनीति गिर गयी, सत्ता से चिपक गयी,
राजतंत्र बन गयी, सविधान ढाल बनी।
लोक तंत्र नाम धरा, लोक तो मर गया,
तंत्र में हैं दब गया, बुरी तरह से सड गया।
जाति निर्धनता बनी, जाति ही शोषित बनी,
मानवता सिसक रही,दर्द जाति से तौली गयी।
समानता की बात तो किताबों में सिमट गयी,
आज सत्यमेव जयते की अर्थ भी बदल गयी।
अपनी पीठ थपथपा रहें, ठहाके खोखले लगा रहें,
नैतिकता सिद्धांत सब, अपने हिसाब से बना रहें।
कत्ल क़र मानवता का, पाठ नीति का पढ़ा रहें,
भृष्ट आचरण छुपा, ढोंग संत का हैं क़र रहें।
यही तो पाखंड वाद हैं, यही तो महा पाप हैं,
बेशर्म दानवी सोच को, जो मानवीय कह रहें।
जन तंत्र के नाम पर, जनता में भेद क़र रहें,
ग़रीबी और शोषण का पैमाना जाति मान रहें।
-चन्द्रकान्त दुबे
उरई(यूपी)
