अपनी क़िस्मत की लकीरें, अपने हाथों से लिख लें,
सपनों की ज़मीं पर, ख़्वाहिशों के अंश लिख लें।
पाँव ज़ख़्मी हों अगर, चलने का हुनर तो आएगा,
संघर्षों को आग लिखकर, स्वर्ण-सा विश्वास लिख लें।
राह में काँटे बिछे हों, तो फिर शिकायत क्या करूँ,
पाँव के छालों को भी, मंज़िलों के साथ लिख लें।
हार के क़िस्से सुने हैं, हर दौर में हमने बहुत से,
अब बुलंदी की कहानी, अपने हक़ में आज लिख लें।
अपने सपने और साहस, साथ में विश्वास लेकर,
इस धरा पर प्रेम के, हर उचित सद्भाव लिख लें।
जो अँधेरों को सदा तक़दीर अपनी कहते आए,
उनके हिस्से में उभरता, एक नया इतिहास लिख लें।
-श्रीमती शिवा सक्सेना
छतरपुर (मध्य प्रदेश)
