घर-घर में अब शान बनी है,
चाय बड़ी गुणकारी है,
बिना चुस्की के आज दुनियां,
लगती बड़ी बेचारी है।
सुबह उठे तो चाय चाहिए,
दोपहर में फिर प्याली,
शाम ढले तो गप्पों संग में,
हो जाती है रखवाली।
ऑफिस वाले बाबू जी तो,
काम से ज्यादा पीते हैं,
फाइल चाहे धूल खा जाए,
चाय पे भाषण देते हैं।
नेता जी भी मंच सजाकर,
जनता को समझाते हैं,
हाथ में कप, होंठों पर वादे,
सपने खूब दिखाते हैं।
कुछ लोग ऐसे भी देखे,
डाइट का गुण गाते हैं,
समोसे चार दबाकर फिर भी,
ग्रीन टी अपनाते हैं।
रिश्तों की अब नई परिभाषा,
चाय से तय हो जाती,
जिस घर में अदरक ज्यादा हो,
वहीं मित्रता निभ जाती।
महँगाई चाहे बढ़ती जाए,
जेब भले हल्की हो जाए,
चाय की खातिर जनता फिर भी,
दूध-पत्ती ले ही आए।
वाह री तेरी लीला चाय!
सबको खूब नचाती है,
दो चुस्की क्या अंदर जाएँ,
दुनिया स्वर्ग दिखाती है।
-प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”
