मेरा साहित्य का सफ़रनामा

मेरे पिताजी स्व. श्री बाबुलाल जी अरोरा (इतिहास के व्याख्याता) और मेरी बड़ी बहन स्व. सुश्री शरद अरोरा (स्नातक) साहित्यिक अभिरुचि रखते थे। लेखन उनका शगल था।
मेरी माताजी स्व. श्रीमती कमलआशा जी अरोरा अपनी 89 वर्ष की अंतिम अवस्था (2024) तक पठनरुचि में संलग्न रही। हर तीसरे दिन एक नई पुस्तक पठन की मांग, कई पुस्तकों का आवृत्ति में पठन देख परिवार के सदस्य तो ठीक, मोहल्ले वाले भी आश्चर्य करते थे।

ऐसे परिवार का एक हिस्सा था मैं, जिसे निरंतर शब्दों को समझने और उनसे खेलने का अवसर मिला।

1979 में (हायर सेकंडरी उत्तीर्ण करने के उपरांत) कुछ समय के लिए समाचार पत्र संवाददाता की भूमिका में भी रहा, तब से मेरी सामाजिक टिप्पणियों (विषय पर प्रतिक्रियात्मक आलेख) और कविताओं को सामाजिक पत्रिकाओं में स्थान मिलने लगा था।

अगस्त 1982 में जब मेरा प्रवेश हिंदी आशुलिपि प्रशिक्षण हेतु इंदौर आईटीआई में हुआ, तब पता चला इतना सब कुछ होते हुए भी मेरा हिंदी भाषा ज्ञान (व्याकरण की दृष्टि से) शून्य है। प्रशिक्षण पाठ्यक्रम अगस्त 1982 से जुलाई 1983 तक का था, जहाँ वर्णमाला से प्रारंभ व्याकरण के गहन अध्ययन का अवसर मुझे मिला, क्योंकि पूरे सालभर प्रतिदिन 45 मिनट के दो कालखंड (कुल 90मिनट) हिंदी भाषा के और इतने ही समय के दो कालखंड हिंदी आशुलिपि के निर्धारित थे। मेरा भाषा ज्ञान परिष्कृत होता गया।
इस दौरान समाचार पत्रों में संपादक के नाम पत्र लिखने की रुचि पैदा हुई। अगस्त 1983 में दैनिक “स्वदेश” इंदौर कार्यालय में वरिष्ठ संपादक श्री कृष्ण कुमारजी अष्ठाना जी के सानिध्य में कार्य करने का प्रस्ताव भी मुझे मिला लेकिन, पारिवारिक कारणों से सेवा स्वीकार नहीं कर सका।

इंदौर की यह एक वर्ष की प्रशिक्षण अवधि मेरी लेखन अभिरुचि को तीव्रता दे गई। मैने अगस्त 1983 में ही लोकनिर्माण विभाग की सेवा प्रारंभ की और कालांतर में यह सेवा त्याग कर 1985 में बैंक सेवा में पदस्थ हुआ। इस दौरान लेखन के अतिरिक्त मेरी रुचि ड्राइंग /स्केचिंग में भी रही अत: संतुलन बनाते हुए (कलम और कूँची शीर्षक से) अपनी रचित कविताओं पर अपने द्वारा सृजित चित्रों के पोस्टर भी तैयार किए, जिनमें से कुछ पोस्टर महानगरों के कारपोरेट ऑफिस तक भी पहुँचे। 1997-98 का वह दौर भी आया, जब विभिन्न समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में मेरी कलम (पत्र, आलेख, कविता, कार्टून आदि ) को निरंतर स्थान मिला।

कालांतर में विभिन्न साहित्यिक संगठन में सक्रियता निरंतर है। 2019 का कोरोनाकाल हम जैसे मित्रों के लिए स्वर्णिम काल साबित हुआ। अपने राष्ट्रीय पटल वाट्सएप ग्रुप “कला, साहित्य और संस्कृति” से कई ऑन लाइन गोष्ठियाँ आयोजित की। इस दौरान “अन्तरा शब्दशक्ति” के दैनिक विषयों ने विशेष रूप से आकर्षित किया और इस साहित्यिक मैराथन में मैने भी सहभागिता की।

2019 में मेरी दो कृतियाँ (पुस्तकें) दिल्ली से प्रकाशित हुईं।
2026 में अप्रैल माह तक दो अन्य कृतियाँ पिलानी राजस्थान से प्रकाशित हुई हैं। यह यात्रा निरंतर जारी है

यहाँ यह पृथक से उल्लेखनीय है कि सुलिपि अर्थात कैलीग्राफी में भी मेरी अभिरुचि रही, और मैं बैंक सेवा में होने के बावजूद अतिरिक्त समय में शालाओं में जाकर/ निवास पर समय समय पर शिविर आयोजित करता रहा हूँ, अत: शिक्षकों और छात्रों के अनुरोध पर निजी स्तर पर तैयार किए गए पाठ्यक्रम की पुस्तक भी 1998 में उदयपुर से प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन पुस्तक शैक्षिक श्रेणी में है।

पुरस्कार और सम्मान की जहाँ तक बात है, इसका उल्लेख (बहुत कुछ होते हुए भी) मैं कभी करना नहीं चाहता हूँ। क्योंकि पुरस्कार और सम्मान “शिक्षार्थी” को गति देते हैं, (उनकी संख्या गिनने और प्रदर्शित करने की बनिस्बत) उन्हें आत्मसात कर आगे बढ़ने का श्रम अधिक माने रखता है।

आप सभी की शुभकामनाएं साथ रही तो यह “शिक्षार्थी” बहुत कुछ हासिल करते हुए भी “शब्द पिपासु” बना रहेगा।

-प्रदीप कुमार अरोरा
पुणे

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