मेरा साहित्यिक परिचय

03/08/1948 को दिल्ली के एक उच्च मध्यम वर्गीय परिवार में जन्म हुआ। हम दिल्ली में कमला नगर में रहते थे। वहीं पर पाँचवी कक्षा तक एमसीडी के स्कूल में पढ़ाई की। वैसे हमारे दादा दादी को लड़कियों को ज्यादा पढ़ने पर आपत्ति थी। माता-पिता भी कुछ इसी विचार के थे कि लड़कियों को साक्षर होना चाहिए।ज्यादा पढ़ाकर कोई नौकरी तो करवानी नहीं है। इसलिए पढ़ने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़े।पाँचवी कक्षा से आठवीं कक्षा तक सरकारी स्कूल से हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की।
जब मैं आठवीं कक्षा पास कर चुकी थी तो आगे पढ़ने पर पाबंदी लगा दी गई।मेरी बड़ी बहन और दो छोटी बहनें बहुत आज्ञाकारी थीं।उन्होंने आगे पढ़ने के लिये कभी जिद नहीं की लेकिन मैंने आगे पढने की जिद ठान ली।
हमारे घर के पास ही एक कोचिंग इंस्टिट्यूट था। वहाँ लिखा हुआ था,
‘आठवीं पास दसवीं करें’
माता-पिता से बहुत खुशामद करके दसवीं कक्षा में दाखिला लिया। उन दिनों यह हाल था कि जो भी पढ़ती थी, वह रट जाता था। कई बार तो अध्यापकों को यह लगता था कि मैंने वाकई रट्टा मारा है। एक बार उन्होंने मुझे एक पुस्तक दी और उसमें से एक पाठ पढ़ने के लिए कहा। मैंने 5 मिनट में ही पढ़ लिया। उन्होंने सुनाने के लिए कहा। मैंने पूरा सुना दिया। उन्हें लगा कि मैंने शायद यह पहले से ही पढ़ा हुआ होगा।बी.ए की कक्षा से एक पुस्तक ‘रश्मिरथी’ मँगाई गई। उसमें से एक अंश पढ़ने के लिए कहा। मैंने पाँच मिनट में पढ़ लिया।उन्होंने सुनाने के लिए कहा। मैंने पूरा सुना दिया। उन्हें लगा मैंने शायद यह भी पहले से ही पढ़ा होगा। उन्होंने एम.ए की कक्षा से ‘यशोधरा’ नामक पुस्तक मँगाई और उसमें से एक कविता पढ़कर सुनाने के लिए कहा। मैंने पाँच मिनट में ही पढ़कर सुना दिया। बहुत हैरान हुए और बोले कि कौन सी चक्की का पिसा हुआ आटा खाती हो?
मैंने कहा-” हमारी अपने ही घर की चक्की है।”
उन्होंने कहा कि तुम्हारा दिमाग इतना तेज है कि तुम्हारी स्कॉलरशिप आ सकती है। यदि तुम्हारी स्कॉलरशिप आ गई तो मैं तुम्हें ₹60 का इनाम दूँगा। यह बात सन् 62 की है। हिसाब लगा लो कि उस समय ₹60 की कितनी कीमत होती थी। मेरी स्कॉलरशिप आई।
ऐसा ही एक और किस्सा हुआ। मैंने एक नाटक की मोनो एक्टिंग की थी। नाटक को केवल एक बार पढ़ा था और संवाद याद हो गये थे। उन्हें मोनो एक्टिंग बहुत पसंद आई और मुझे ₹2 इनाम के तौर पर दिए। घर में आकर बहुत खुश होकर पिताजी को यह बात बताई। इतनी डाँट पड़ी कि कुछ पूछो ही मत। पिताजी ने कहा कि तुमने अपनी कला को बेच दिया है।क्या तुम नट हो जो कला बेचकर पैसे कमा रहे हो? यदि उन्हें इनाम ही देना था तो कोई किताब भी दे सकते थे। यह पैसे कल ही स्कूल में जाकर वापस करना। मैंने स्कूल में जाकर पैसे वापस किए और घर में पड़ी डाँट का विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। उन्होंने मुझसे ₹2 ले लिए और मुझसे पूछा कि बताओ तुम्हें कौन सी किताब चाहिए। गीतांजलि या कोई अन्य पुस्तक?
मैं चुप रही और सोचा कि जैसी पुस्तक ठीक समझेंगे, अपने आप दे देंगे।वो इनाम की बात भी भूल गए और किताब की बात भी भूल गये। सन् 64 में मैंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा दी और पूरी दिल्ली में टॉप किया।उसके बाद किसी भी कीमत पर पढ़ने की इजाजत नहीं मिली।हायर सेकेंडरी करने की इजाजत के लिये भी दो महीने लगातार खुशामद की थी।दिल्ली के लगभग सभी कॉलेज से मुझे पत्र मिले कि हमारे कॉलेज में एडमिशन लो। यूनिवर्सिटी के वजीफे के अलावा हम भी तुम्हें वजीफा देंगे।लेकिन सब फिज़ूल। मुझे सिलाई कढ़ाई के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया क्योंकि उनके हिसाब से लड़कियों को यह काम आना बहुत जरूरी है और यह सच भी है। यह काम… मेरे बहुत काम आया।
1965 में भारत और पाकिस्तान में युद्ध छिड़ा हुआ था। मैं उन दिनों उषा सिलाई स्कूल में सिलाई कढ़ाई की ट्रेनिंग ले रही थी। उस समय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने देश के लोगों में देशभक्ति का ऐसा जज्बा पैदा कर दिया था कि महिलाओं ने अपने आभूषण तक देश की रक्षा के लिए दे दिए थे। मुझमें बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा कूट- कूट कर भरा हुआ था। मैंने सोचा कि हमें भी देश के लिए कुछ करना चाहिए। पर क्या??
चाह हो तो राह भी मिल ही जाती है। मैंने अपनी प्रिंसिपल से कहा कि मैडम क्यों न हम स्कूल में कपड़ों की एग्ज़ीबिशन लगायें। उससे जो पैसा आएगा, वह हम प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करा देंगे। मैडम मुझ पर ज्यादा ही कृपालु रहती थीं और मुझे बुद्धिमान भी समझती थीं क्योंकि जो ड्राफ्टिंग अन्य छात्राओं को सप्ताह में केवल एक बार देती थीं और एक सप्ताह में भी वे लोग उस डिज़ाइन को पूरा नहीं कर पाती थीं,मैं अगले दिन ही पूरा करके ले जाती थी। मान लो छह तरह के फ्रॉक होते हैं तो कायदे से 6 हफ्ते में सिखाएँगे, किंतु मैं अगले दिन ही फ्रॉक हो या सूट,कुर्ता हो या पाजामा,पैण्ट हो या कमीज, या अलग-अलग तरह के ब्लाऊज़ …अगले दिन ही पूरा करके ले जाती थी और वह उसमें कोई कमी भी नहीं निकाल पाती थीं। पाइपिंग एकदम सफाई से लगी होती थी। एकदम बारीक होती थी। काज भी एकदम सफाई से बने होते थे इसलिए मजबूरन उन्हें अगले दिन दूसरी ड्राफ्टिंग सिखानी ही पड़ती थी और शायद इसीलिए उनकी नजरों में मैं श्रेष्ठ शिक्षार्थियों की श्रेणी में आती थी।मैडम को मेरी बात पर पूरा यकीन था लेकिन यह होगा कैसे?? यह सवाल उनके मन में था। मैंने कहा,
” मैडम आप केवल अनुमति दे दें। बाकी सब कुछ मुझ पर छोड़ दें। बस इन छात्राओं से केवल इतना कह दें कि अपने घर से जितने भी छोटे बड़े कपड़ों के टुकड़े हैं, लेकर आएँ।” उन्होंने सबको वैसा ही आदेश दे दिया। वैसे भी वहाँ पास में ही बाजार था, जहाँ कपड़ों की ढ़ेरों दुकानें थीं।सिलाई सीखने वाली लड़कियाँ वहीं से छोटे कपड़े बनाने के लिये कटपीस खरीदती थीं।
अनुमति मिलने के बाद मैंने योजनानुसार काम करना शुरू किया। चार्ट पेपर काटकर छोटे-छोटे टिकट बनाए और उन पर ₹10 दाम लिखा। स्कूल के आस-पास बहुत सारी दुकानें और शोरूम थे। सबको यह कहकर टिकट दिए कि 15 दिन बाद हम अपने स्कूल में सिले हुए कपड़ों की प्रदर्शनी लगाएँगे और उससे जो पैसा इकट्ठा होगा वह हम प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करेंगे। आपसे उम्मीद करते हैं कि देश की खातिर ₹10 का टिकट तो आप लोग खरीद ही सकते हो।मात्र दो दिन में ₹1000 इकट्ठे हो गए और हमारी प्रिंसिपल ही एकमात्र ऐसी थीं जो किसी स्कूल की तरफ से प्रधानमंत्री राहत कोष में ₹1000 जमा करवा कर आईं थीं।उन दिनों ₹1000 की बहुत कीमत होती थी क्योंकि सोना भी केवल ₹110 तोला था। स्कूल में आकर उन्होंने मेरी पीठ थपथपाकर शाबाशी दी।अब उन्हें विश्वास हो गया कि मैं एग्ज़ीबिशन का काम भी कर पाऊँगी। एक कपड़े वाले की दुकान से बहुत छोटे-
छोटे बचे हुए टुकड़े भी मुफ्त में ले आई थी। उसको टिकट दिया था और कहा था कि जो 20-30 इंच के कटपीस तुम्हारे किसी काम के नहीं हैं और जिन्हें तुम कौड़ियों के मोल बेचते हो, हम उनके कपड़े सिलकर प्रदर्शनी लगाएँगे और वह पैसा प्रधानमंत्री राहत कोष में देंगे। जो सैनिक देश की रक्षा के लिए… हमारी रक्षा के लिए… अपने प्राण हथेली पर रखकर बैठे हैं, हमारा भी फ़र्ज है कि हम उनके लिए कुछ करें। आप यह बेकार कपड़े हमें दे देंगे तो आपका कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि देश के लिए एक योगदान होगा। दुकानदारों ने काफी सारे कपड़े दे दिए। छात्राएँ भी अपने -अपने घर से कपड़े ले आईं।उन कपड़ों से मैंने ए लाइन,अंब्रेला कट ,कोट फ्रॉक,चुन्नट वाली फ्रॉक रोम्पर,झबले, टी शर्ट, छोटी निक्कर,बिब वाली स्कर्ट… रंग बिरंगे कपड़े लगाकर कढ़ाई करके बनाईं।एक दिन में तीन चार कपड़े आराम से पूरे हो जाते थे। स्कूल टाइम में सैनिकों की वर्दी सिलती थी।
घर में आज तक किसी को इस बात का पता नहीं है कि मैंने यह सब कुछ किया। यदि पता लग जाता तो मैं किसी भी दुकान पर टिकट देकर ₹1000 इकट्ठे नहीं कर पाती और न ही प्रदर्शनी लगा पाती।
जितने कपड़े हमारे पास थे, वह सब सिल गये तो बारी आई प्रदर्शनी लगाने के लिए बाकी सामान की।मसलन बाँधने के लिये रस्सी, लटकाने के लिए हैंगर,चिमटियाँ बल्ब व बैनर इत्यादि। स्कूल के बराबर में ही ड्राईक्लीनर की दुकान थी। उससे सैनिकों का और देश का हवाला देकर मुफ्त में हैंगर लेकर आई। पहले तो आनाकानी कर रहा था। उसको समझाया कि दो दिनों में तुम्हारे हैंगर यदि हम इस्तेमाल कर लेंगे तो न तो तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा न ही इन हैंगरों का , बल्कि किसी की जिंदगी जरूर संवर जाएगी। तुम्हारे हैंगर तीसरे दिन बाइज्जत वापस मिल जाएँगे। ऐसे ही एक दुकान से रस्सी, एक से चिमटियाँ, एक से बल्ब आदि लाकर ढंग से कपड़े सजाए। रविवार के दिन प्रदर्शनी लगाई। हालाँकि उस दिन बहुत बारिश हो रही थी।घर में हमने पहले से ही कह रखा था कि हमें रविवार को स्कूल जरूर जाना है क्योंकि हमारी मैडम ने हमारे द्वारा सिले गये कपड़ों की प्रदर्शनी लगवानी है।
हम रविवार को स्कूल गए। काफी दुकान वाले इस प्रदर्शनी में आये। जो कपड़े उन्हें अच्छे लगे वे मुंहमाँगे मूल्य पर उन्होंने खरीद लिए। एक ही दिन में ₹5000 इकट्ठे हो गए जिन्हें हमारी प्रिंसिपल दोबारा प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा करवा आईं।अगले दिन मैंने हैंगर वाले के हैंगर, चिमटी वाले की चिमटियाँ, रस्सी वाले की रस्सी बल्ब वाले का बल्ब… आभार सहित सबका सामान वापस किया। सबका एक ही कहना था कि-” बिटिया तुमने हमारी आँखें खोल दीं। इसमें आभार किस बात का। तुम बच्ची होकर इतना कर सकती हो। आभार तो हमें तुम्हारा मानना चाहिए।तुमने हमें सिखाया कि सैनिक हमारी रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं तभी हम आराम से अपनी रोजी रोटी कमा पा रहे हैं। बिटिया धन्य है वह माँ- बाप जिन्होंने तुम्हें पैदा किया। भगवान तुम्हारे जैसी बेटी हर किसी को दे।”
मेरी प्रिंसिपल तो मुझसे इतनी खुश थीं कि उन्होंने स्कूल के हेड ऑफिस तक यह समाचार भेजा। उषा सिलाई स्कूल की उन दिनों कई ब्रांच थीं। जब परीक्षा पास करने के बाद सर्टिफिकेट दिए गए तो मेरा सर्टिफिकेट स्वयं ब्रांच मैनेजर ने आकर दिया।
लेखन की प्रतिभा शायद ईश्वर ने मुझे जन्मजात ही दी थी क्योंकि घर में बातें भी करती थी तो तुकबंदी करके करती थी।
विशेष लेखन की प्रेरणा तब मिली जब
1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया। आक्रोश में बहुत सी कविताएँ लिखीं जो वक्त के गाल में समा चुकी हैं।
स्वतंत्र विधा में अनेक लेख, संस्मरण, कविता, कहानी, यात्रा संस्मरण लिखे हैं।
जब पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर आक्रमण किया, तब पहली रचना(एक कविता व एक लेख) नवभारत के बाल भारत में प्रकाशित हुए थे, किंतु घर में पता लगने पर लिखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
विवाह के बाद जीवन में पाँच बार टाइफाइड,तीन बार मलेरिया,कई बार जॉन्डिस,ट्यूबरक्लोसिस,
एक हादसे में कनपटी की तीन व गाल की हड्डी टूट गई थी जिसका अब ब्रेन ट्यूमर बन चुका है।बीमारियों को मुझसे कुछ ज्यादा ही प्यार है।

सन् सत्तर में जिस परिवार में विवाह हुआ वो कभी नम्बरदार थे। जमींदारी एबोलिशन एक्ट के बाद दिल्ली आ गए। मेरे ससुर का देहांत मेरी शादी से पाँच वर्ष पूर्व हो चुका था। पति अकेले कमाने वाले थे।मैंने तो चार वर्ष बाद नौकरी शुरु की।पति की इच्छा थी कि मैं स्नातक करूँ।उनकी इच्छा का मान रखते हुए विवाह के चौदह वर्ष बाद पत्राचार माध्यम से स्नातक करना शुरु किया।स्नातक के प्रथम वर्ष में पूरी यूनिवर्सिटी में द्वितीय स्थान। प्रथम आने वाले से केवल एक अंक कम था।

संयुक्त परिवार में मैंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ सहा।न जाने अपमान के कितने कड़वे घूँट पिए। लेकिन मेरे साथ एक अलग बात थी।जब मेरा विवाह हुआ,उससे कई वर्ष पहले मेरे श्वसुर का देहांत हो चुका था।सात बच्चों और पत्नी को असहाय अवस्था में बिलखता छोड़कर युवावस्था में ही भगवान ने उन्हें अपने पास बुला लिया था। मेरे पति सबसे बड़े व अकेले कमाने वाले थे। मैं परिवार की सबसे बड़ी बहू… इसलिए अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकती थी।
पिता मेरे पति को उनके ऑफिस में देख कर आए थे। किसी रिश्तेदार ने लड़का बताया था। उन्हें पता था कि मैं उस घर में एडजस्ट कर सकती हूँ।उन्हें मेरी आदतों के बारे में मालूम था। मेरी शुरू से यह तमन्ना थी कि एक ऐसा गाँव बसाऊँ, जिसमें कोई गरीब न हो। सबको सब तरह की सुविधाएँ हों।
जिस घर में रिश्ता किया है जिसमें 6 × 12 का केवल एक कमरा है, जिसमें इतना बड़ा परिवार रहता है।वही एक कमरा… रसोई भी है और स्नानागार भी… बैठक और शयनकक्ष भी। माँ ने भी यही कहा कि, “तेरी यही तमन्ना थी ना कि तू एक ऐसा गाँव बसाना चाहती थी,जहाँ सबको सब तरह का सुख दिलवा सके। तेरा ससुराल भी एक छोटा मोटा गाँव ही है। जाकर वहाँ सबको सुखी रखना।”
हमने भी इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
मायके में सभी प्रकार की सुविधाएँ थीं और ससुराल में हर प्रकार की सुविधा का अभाव था, किंतु सच्चाई यह भी है कि सुविधाओं में रहते हुए तो हम बड़ी आसानी से कह देते हैं कि हम कम आमदनी में भी गुजारा कर सकते हैं, लेकिन जब यथार्थ की कठोर धरती पर कदम रखते हैं, तब उनका किस प्रकार के सामना कर पाते हैं, उस वक्त हमारी परीक्षा की घड़ी होती है।विवाह से एक माह पूर्व एक 6×8 का कमरा बनवाया गया।
मायके में तीन मंजिला घर,तीन शौचालय,तीन स्नानागार,तीन वाशबेसिन,बड़ी सी रसोई और ससुराल में पुराने स्टाइल का शौचालय और जाने वाले 30 लोग।हमने वो चुनौतीपूर्ण समय भी हँसकर काटा।लेखन का शौक तो लगभग खत्म ही हो गया था।जब चार साल बाद नौकरी शुरु की तो इस शौक ने छलांग लगानी शुरु की। पैदल आती जाती थी।रास्ते में ही मधुरलोक नामक एक प्रकाशन था।हाथ से लिखकर अपनी रचनाएं दे आती थी।मेरे पति के अलावा किसी को नहीं पता।
1976 से 1978 तक उस मासिक पत्रिका मधुर लोक प्रकाशन में नियमित रूप से हर माह मेरी रचना प्रकाशित होती थी।
फिर अन्तरा शब्दशक्ति प्रकाशन के वेब पेज/स्टोरी मिरर/हिन्दी प्रतिलिपि/युवा प्रवर्तक/लक्ष्यभेद/हिन्दी भाषा.काॅम पर ई प्रकाशन
लगभग 50 साझा संकलनों में मेरी रचनाएं प्रकाशित हुई हैं ?
कुछ नाम लिख रही हूँ। सब याद नहीं हैं।
मधुबन/काव्य कस्तूरी/सृजन गुच्छ तृतीय,/स्त्रीत्व/काव्यरस/बासंती अंदाज/जागृति/नई रोशनी नई पहल/नए पल्लव-7/नए पल्लव-8/वूमेन आवाज नारी से नारी तक/अनोखा वर्ष 2020/हौंसले के शब्द/हुलास/अनुबंध,मोटापे का राज बता दो,हँसगुल्ले,ये मोदी वाला भारत है,ऑपरेशन सिंदूर,माँ तुझे सलाम,इनसे हैं हम,अशोकचक्र विजेता,भारत के भारतरत्न,पद्म श्री विजेता,भारत की वीरांगना,चेतना के स्वर,हौसलों के हमसफर,प्यार के रंग हजार आदि
लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूँ । बहुत कुछ लिखा हुआ है, लेकिन बिखरा हुआ है। उसे समेटना पड़ेगा। समय मुझे जितना समय देगा… उसका सदुपयोग करूँगी। हालांकि स्वास्थ्य इजाजत नहीं देता इसके बावजूद भी मैं बीमारी को धोखा देने में कामयाब हो ही जाती हूँ।
वर्ष 2008 में जो पुरस्कार मिला, उसे मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानती हूँ। इंडिया हैबिटेट सेंटर में मुझे पुरस्कृत किया गया। उस समय भारत के सभी शहरों से डॉक्टर आए हुए थे। जूनियर डॉक्टर ने मेरी बीमारी की हिस्ट्री बताई। उसके बाद मैंने इस विषय पर बोला कि मरीज बीमारी से नहीं… बीमारी के एहसास से मरता है। जूनियर डॉक्टर पहले ही मेरे ब्रेन ट्यूमर के बारे में बता चुकी थीं। वहाँ से मुझे सम्मान पत्र, ₹1000 नकद व बहुत खूबसूरत फोटो फ्रेम मिला। 4 फोटो बाद में डाक द्वारा मुझे घर भेजी गईं। सभी डॉक्टर ने मुझसे हाथ मिलाया और कहा कि इतनी बीमार रहने के बावजूद भी आपके चेहरे से बिल्कुल नहीं लगता कि आप बीमार हो। हमें हिंदी नहीं आती। हम हिंदी पढ़ भी नहीं सकते लेकिन आपके एक्सप्रेशन करने के ढंग ने सब कुछ बता दिया। हम आपके इस जज्बे से बेहद प्रभावित हैं।
जिस न्यूरो सर्जन से मेरा इलाज चल रहा था, उन्होंने मुझे मंच पर बोलने के लिए प्रोत्साहित किया था क्योंकि उन्हें लगा था कि शायद मुझे लिखने का शौक है और यह बात उन्होंने मुझसे पूछी भी थी। यह भी पूछा था कि क्या आप मंच पर बोल सकती हैं। मेरे उत्तर देने से पहले ही पति ने कह दिया था कि इन्हें तो मंच पर बोलने का बहुत शौक है क्योंकि जब मैं सरकारी नौकरी में थी तो ज्यादा अवधि तक स्कूल के प्रशासनिक विभाग में रही। स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते थे। 15 अगस्त और 26 जनवरी को मुझे मंच पर अचानक आमंत्रित कर दिया जाता था। तब मैं बढ़-चढ़कर देश के बारे में अपने विचार प्रकट करती थी। 2008 में सेवानिवृत्ति के बाद यह सब कुछ छूट गया।
कवि सम्मेलन के मंचों पर काव्य – पाठ भी किए, लेकिन बहुत कम जब करना चाहा… तब अनुमति नहीं मिली। अब अनुमति है लेकिन स्वास्थ्य इजाजत नहीं देता। अकेले जा भी नहीं सकती। ब्रेन ट्यूमर की दवाइयाँ खाने से आवाज में बहुत बदलाव आ गया है और वैसे भी बोलते- बोलते अकस्मात आवाज गुम हो जाती है। हम जैसे उम्रदराज लोगों को कौन सुनना पसन्द करेगा। हाँ अपनेङ आस-पास कवि सम्मेलन होता है तो वहाँ कई बार काव्य पाठ का मौका मिला। कोरोनाकाल में अनेक ऑनलाइन काव्यगोष्ठियों में हिस्सा लिया।आजकल भी लेती हूँ। कभी एकल लाइव प्रस्तुति भी होती है।
बहुत सी रुचियाँ भी पाल रखी हैं। नौकरी के दौरान ही योग डिप्लोमा,रंग चिकित्सा, मुद्रा विज्ञान, शिवाम्बु चिकित्सा व एक्यूप्रेशर का अल्पकालिक कोर्स किया।
रुचियाँ:-पाक कला, पठन-पाठन, लेखन, व्यर्थ समझी जाने वाली वस्तुओं का उचित उपयोग,बेहद जुनूनी हूँ। पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक व अन्य को जागरूक करने में प्रयासरत रहती हूँ
प्रकाशित पुस्तकें :-
11 एकल पद्य संग्रह
काव्य मंजरी/ निनाद/ जीवन एक खिलौना/ नयी उम्मीद नया आसमान / अजब अनोखे खेल / एक ख्वाब अधूरा सा/ आपातकाल में सृजन फुलवारी/ अन्तर्नाद/ ऊँची नीची है डगरिया/
प्यासी धरती तपस्विनी सी/भीगे सपने

18एकल गद्य संग्रह
पाती प्रीत भरी (भाग -1)/
पाती प्रीत भरी (भाग-2)/हादसा/आपातकाल में सृजन फुलवारी/नया मोड़/क्या- क्या न सहे हमने सितम/तेरे नाम/यादों के झरोखे से (भाग-1)/ गली जाजमपुरिया/सृजन समीक्षा/बकरा मिल गया/अकस्मात/
यात्रा वृत्तांत/ देश- परदेश भाग- 1
यात्रा वृत्तांत देश परदेश भाग-2
सामाजिक मुद्दे श्रृंखला-1
सामाजिक मुद्दे श्रृंखला-2
कब जागोगे
मन के जीते जीत
1976 से 1978 के दौरान नियमित रूप से एक मासिक पत्रिका में रचनाओं का प्रकाशन*
अन्तरराष्ट्रीय स्तर की पुस्तकें
इनसे हैं हम (गुमनाम शहीदों के बारे में गद्य लेखन) /
भारत के भारत रत्न/आजादी का जश्न भाग-1 में (गुमनाम क्रान्तिकारियों के बारे में तीन लेख)/आजादी का जश्न भाग-2 में दो गुमनाम क्रान्तिकारियों की कहानी /भारत के अशोक चक्र विजेता/ हिन्द के प्रहरी/ स्वराज के स्वर/ हौसलों के स्वर (पद्म श्री सम्मान से सम्मानित विभूतियों के बारे में)
हौसलों के हमसफर/ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकारों के बारे में पद्य संग्रह /वैश्विक हिन्दी सम्मेलन मंच में 14/9/21 को लेख प्रकाशित
-50 से अधिक साझा संग्रह प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित/गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड /लन्दन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड,अनेक वेब पोर्टल:- स्टोरी मिरर, प्रतिलिपि, हिन्दी प्रतिलिपि, युवा प्रवर्तक, हिन्दी भाषा डाॅट काॅम, नवकिरण द्वै मासिक पत्रिका, आदित्य संस्कृति व अन्य ई- पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन
विशेष:-अंतरा शब्द शक्ति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी एक गद्य पुस्तक
नया मोड़ को पुरस्कृत श्रेणी की पुस्तकों में चयनित किया गया। आदित्य संस्कृति द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में 368 लेखकों ने अपनी प्रविष्टियां दी थीं, जिनमें 22 लेखकों की पुस्तकें चयनित हुईं।
-एक अन्य पुस्तक तेरे नाम को भी पुरस्कृत किया गया। इसमें 168 लेखकों ने अपनी प्रविष्टियाँ प्रस्तुत की थीं।
-एक प्रतियोगिता मेंअंतरा शब्द शक्ति द्वारा पुरस्कार राशि मेरे खाते में जमा की गई।
सम्मान:- शताधिक मिले, कभी गिने ही नहीं। कुछ जो याद हैं,उनका वर्णन👇
अक्टूबर 2008 में इंडिया हैबिटेट सेंटर में
एसोसिएशन इंडियन एपिलेप्सी सोसाइटी द्वारा 9 वें वार्षिक सम्मेलन में बोला कि मरीज बीमारी से नहीं, बीमारी के एहसास से मरता है। विषय पर बोलने के लिए सम्मानित किया गया।
-इंडिया बुक ऑफ़ रिकार्ड्स -लंदन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स
-Golden Book of World Record में दर्ज अंतर्राष्ट्रीय काव्य श्री सम्मान
मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा 03/02/2018 को ‘भाषासारथी सम्मान’
व अन्तरा शब्दशक्ति सम्मान 2018 से सम्मानित
कर्मयोगी सम्मान 2018 इन्द्रप्रस्थ भारती द्वारा
भाषासारथी सम्मान 2018
शब्द साधक सम्मान 2018
भाव भाषा निर्झरिणी सम्मान 2020
कलम के सिपाही 2020
-वूमेन आवाज सम्मान
-मातृभाषा उन्नयन सम्मान
स्वामी विवेकानंद सम्मान 2020
समय साक्षी सम्मान 2020
साहित्य साधक सम्मान 2020
नवसृजन सम्मान 2020
मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच (जिसकी पूरे भारत के सभी राज्यों में प्रान्त व जिलों में शाखाएँ व उपशाखाएँ हैं) हुंकार दिवस 15/8/21 को ‘मातो श्री सम्मान’ 2021 व ‘गुरु आशीर्वाद सम्मान’ 2021
-साहित्य साधक सम्मान
-समर्थ नारी गौरव सम्मान –
जीवन योद्धा सम्मान
-प्रजातंत्र का स्तंभ गौरव सम्मान
मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच द्वारा सम्मान
-इंद्रप्रस्थ तूलिका स्वर्ण -वात्सल्य सम्मान 2021-22
-लाल बहादुर शास्त्री साहित्य रत्न सम्मान 2022-23
-हुंकार सम्मान
-गुरु आशीर्वाद सम्मान
-वरिष्ठ पदाधिकारी सम्मान
-साहित्य मेधा चक्र सम्मान
-राष्ट्रकिंकर द्वारा कर्मयोगी सम्मान
राष्ट्रीय आंचलिक साहित्य संस्थान हरियाणा द्वारा संचित काव्य तरंग साहित्य सम्मान
पुस्तक बैंक द्वारा विश्व भारती हिंदी सम्मान 2020
-समय साक्षी सम्मान 2020
-लक्ष्य भेद पब्लिकेशन द्वारा लक्ष्य भेद शक्ति आराधना सम्मान
-शब्द अमृत सृजन सम्मान 2021
-हिंदी गौरव सम्मान
-प्रणेता साहित्य गौरव सम्मान
-कलश कारवां फाउंडेशन बेंगलूर द्वारा नारी शक्ति
सम्मान 2023
-सृजन सम्मान 2023
-शब्द शब्द दर्पण द्वारा महिला शक्ति सम्मान
-कलम के हस्ताक्षर मंच द्वारा मुझे शिकायत है विषय पर उत्कृष्ट वाचन के लिए आयुष गौरव सम्मान 2023
-राष्ट्रीय नई चेतना संगठन द्वारा गणतंत्र में निरपेक्ष पत्रकारिता विषय पर लिखने के लिए सम्मान पत्र मई 2024
-साहित्य अकादमी से अखिल भारतीय अकादमी सम्मानित मंच हिंदी bhasha.com द्वारा अनेक बार सम्मान
-भारत के सबसे बड़े बहुभाषी साहित्य मंच स्टोरी मिरर से अनेक बार ऑथर ऑफ द वीक के लिए शार्टलिस्ट किया गया।
-अखिल भारतीय साहित्य मंथन शोध संस्थान द्वारा भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी सेवी सम्मान 2022
-शब्द श्री साहित्य सम्मान 2022
चलितभाष :-
9811599770
अणुमेल
radhagoyal222@gmail.com

-राधा गोयल  

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