मेरा कहीं भी साहित्य और लेखन से दूर-दूर का वास्ता नहीं था। परन्तु स्कूल में निराला और पंत जी की कविताएं अच्छी लगती थीं। एम.ए. (इतिहास) से किया। पढ़ाई पूरी होते ही शादी हो गयी। परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी में बिल्कुल समय नहीं मिलता था, परन्तु छुट-पुट कविताएं लिख लेती थी।
प्रकाशन और प्रकाशित होना दूर की बात थी। मन में कुछ आया और थोड़ी-छोटी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने भेज देती थी, जिनमें सरिता, वनिता, गृहलक्ष्मी, गहोई बन्धु आदि में कुछ रचनाएं प्रकाशित हुईं।
मगर मेरी पहचान अन्तरा शब्द शक्ति के माध्यम से हुई। मैंने 2017 से लिखना शुरू किया। मेरी पहली किताब अश्रूबिन्दु प्रकाशित हुई। ऐसा लगा जैसे मेरे पर लग गये हों। यह केवल मेरी एक किताब नहीं थी, मेरा सपना पूरा हुआ था। इसमें मेरी बेटी का पूरा सहयोग था।
दूसरी किताब मुट्ठी भर मोती का प्रकाशन हुआ। इस तरह से पाँच एकल काव्य-संग्रह लिखे, करीब दस सांझा संकलनों में लेखन किया। सहमीं बेटियां एकल काव्य-संग्रह दहेज हत्या पर आधारित है, जो कि पूरी किताब वियोग-श्रृंगार एवं करुण रस पर लिखी गयी है। इसको इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड मिला।
चंद्रयान-3 पर सांझा संकलन ने ग्लोबल बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। बहुत से सम्मान मिले, कई संस्थाओं से सम्मानित किया गया। ग्वालियर में आयोजित गहोई समाज की ओर से म.प्र. में केवल मुझे कर्मवीर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जो कि मेरे लिए गर्व की बात थी।
परन्तु एक साल से मेरे साहित्य-सफर में कुछ कारणों से अवरोध उत्पन्न हो रहे हैं, जिससे मैं कुछ लिखने में असमर्थ हूं।
समय मिलने पर लिखूँगी। अभी मंजिल बहुत दूर है, सफर अभी बाकी है।
आज मैं जो भी हूं, उसमें अन्तरा का भरपूर सहयोग है। इन्होंने ही मार्गदर्शन दिया, प्रोत्साहन दिया, मेरी कलम को एक नयी दिशा, नयी पहचान दी।
कुछ रचनाएं दब जाती हैं,
कुछ इतिहास रच जाती हैं।
राह सही मिल जाये तो,
जज्बात भी स्याही बन लिख जाते हैं।
🙏🏻 धन्यवाद प्रीति जी, बहुत-बहुत आभार के साथ।
-अर्चना कटारे
शहडोल (म.प्र.)
