एक समय के बाद
धीरे-धीरे थकने लगती हैं यात्राएँ,
पगडंडियाँ भूल जाती हैं पैरों की आहट
स्टेशन पर छूटे हुए लोग
स्मृतियों में बदल जाते हैं।
पुरानी डायरी में रखे टिकट
धूल से भर जाते हैं,
और शहर
जिन्हें कभी अपना कहा था हमने,
अजनबी चेहरों की भीड़ में
हमारा नाम तक नहीं पहचानते।
फिर हम
बारिश के बाद की मिट्टी में
ढूँढते रहते हैं बचपन की वह गंध
जो कभी घर हुआ करती थी।
पर घर
एक जगह नहीं रह जाता
धीरे-धीरे एक अनुपस्थित आवाज़ में बदल जाता है,
माँ की पुकार
बरामदे में रखी टूटी कुर्सी
दीवारों पर टँगी पुरानी तस्वीरें
सब समय के साथ
अपना रंग खोते जाते हैं।
और एक दिन
हम समझते हैं
विछोह केवल लोगों का नहीं होता
कुछ दूरियाँ
अपने ही भीतर बन जाती हैं।
जब आदमी
अपने कमरे में चुप बैठा
घड़ी की टिक-टिक सुनता है,
तो वह समय नहीं
उसके भीतर टूटती हुई उम्र होती है।
मैंने देखा है
कुछ लोग पूरी ज़िंदगी
सिर्फ लौटने की इच्छा में जीते हैं,
हालाँकि उन्हें पता होता है
कि कोई भी रास्ता
उन्हें वापस वहाँ नहीं ले जाएगा
जहाँ से वे टूटे थे।
स्मृतियाँ
बहुत विनम्र दिखाई देती हैं बाहर से
पर भीतर वे
धीरे-धीरे खाती रहती हैं मनुष्य को
जैसे बंद अलमारी में
सीलन खाती रहती है कपड़ों को ।
मैं भूलना नहीं चाहती
लेकिन हर याद को ढोते रहना भी
एक प्रकार की मृत्यु है
जहाँ आदमी जीवित दिखता है
पर भीतर से
बहुत पहले उजड़ चुका होता है।
यक़ीन है
जब मैं अंतिम बार
अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखूँगी
तो मुझे कोई बड़ी उपलब्धि याद नहीं आएगी।
बस कुछ अधूरी यात्राएँ
कुछ छूटे हुए हाथ
और कुछ ऐसे घर
जहाँ मैं फिर कभी नहीं लौट सकी,
मैं जाना चाहती हूँ
किसी थकी हुई यात्री की तरह नहीं
बल्कि उस नदी की तरह
जो अपने सारे पत्थरों
और सारी चोटों के बावजूद
समुद्र तक पहुँचने का साहस रखती है।
मेरे भीतर तब भी
एक अधूरी सड़क बची होगी
और आँखों में
दूर कहीं जलती हुई
घर लौटने की आख़िरी रोशनी।
-बबिता कुमावत(सहायक प्रोफेसर)
सीकर(राजस्थान)
