(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
काक्रोच हुए हैं जिंदा,कहनेवाला शर्मिंदा।
उठा है तुफां उन्हीं का,अब थमेगा नहीं।
बेइज्जती कौन सहे,नौजवां सभी ये कहें।
लहू बना ज़लज़ला,अब बुझेगा नहीं।
आग भरा ये कारवां,सत्ता से करें शिकवा।
हक की है ये लड़ाई,कोई झुकेगा नहीं।
शिक्षा से उठी ये क्रांति,मांगे अपनी कहती।
मिटा दो तुम बेकारी,कोई लाचार नहीं।
देश हम बचायेंगे,सबक भी सिखा देंगे।
तिरंगा जान हमारी,कोई नामर्द नहीं।
देखी वो सोच तुम्हारी,मन में नीचता भरी।
तुम करते दलाली,कोई सहेगा नहीं।
जाग उठा है काफ़िला,खत्म करेंगे जुमला।
सर पे बांधें कफ़न,कोई झुकेगा नहीं।
काक्रोच हुए है जिंदा,नेकी उनका इरादा।
अखंड रहेगा जहां,वीरों की है गवाही – –
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर
महाराष्ट्र
