अनंत धारा

झर-झर झरती अनंत धारा, ओ जीवन! ओ चिर-अपरिचिता!
किस अदृश्य सागर की प्यास लिए बहती जाती हो निस्सीमता?

कितनी बार पुकारा मैंने, निशा के पावन आलोक आकाश में,
क्षण भर तो ठहरो धारे, मन की वीणा के स्वर भर लो श्वास में।

यह क्षणभंगुर देह-निकेतन, कुछ स्वप्नों का मधुर बसेरा,
कुछ स्मृतियों के दीप जला कर भर दो इसका रिक्त अँधेरा।

लौटा लाओ वे बीते क्षण, जो कुहासों में सोए हैं,
प्रेम-सिक्त संवादों के मधु-कण अभी तो बोए हैं।

ओ इठलाती निर्झरिणी! यदि तुममें मैं विलीन हो जाऊँ,
बूँद बन तुम्हारी लहरों में अपना अस्तित्व भी स्वयं खो जाऊँ।

उत्स भी जब फूट निकलता है धरती का स्पंदन सुनता है,
कुछ पल उसकी गोद में ठहर एक प्रणय का पाठ पढ़ता है।

क्यों हुई तुम इतनी निष्ठुर? क्यों दिवस-रजनी का कोलाहल?
आओ चलें किसी उपवन में, जहाँ स्वर गाए मधुर मंगल।

फूलों से कुछ रंग चुरा लें, कुछ गंध उधार उठा लाएँ,
जो जीवन विरस हुए हैं, उनमें मधुमास जगा जाएँ।

तपन झुलसा रही भू को, चलो सूरज तक संदेश पहुंचाएँ,
क्यों शांत बैठा है उदधि, उसकी लहरों में ज्वार जगाएँ।

देखो, प्यासी बैठी धरती नभ की ओर नयन पसारे,
चलो मेघों से विनय करें, बरसाएं सावन की फुहारें।

जीवन-चक्रव्यूह के भीतर मैं अभिमन्यु-सी बंधी खड़ी,
पर प्रेम-वचन के एक शर से टूटे किंचित यह घड़ी।

कुछ दुर्योधनों की निष्ठुरता, शकुनियों का छल हर लूँ,
भीष्म-नयन की करुणा ले मानव-हृदय में प्रेम भर दूँ।

तत्पश्चात मत रुकना, तत्पश्चात मत ठहरना,
ओ अनवरत बहती सरिता! बस इतना करना,

विदा कर ले जाना इस तन को, परहित ही उद्देश्य रहे,
जो बूँद बनी और समाहित हुई, वह केवल विस्मृति में बहे।

-डॉ निवेदिता बाँदिल

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