धूल झोंक कर आँख में, छीन लिया सम्मान!
महिमामंडित कर चले, एक-दूजे को श्वान!!
खून पसीना एक कर, जोते खेत किसान!
तब धरती माँ दे रही, झोली भर-भर दान!!
मैदानों में जंग है, खुले आम अब देख!
ईंट जवाब पत्थर से, घर घर बनता लेख!!
माँ की रसोई में बनी, खिचड़ी मन ललचाय!
मुँह में पानी भर गया, लडुआ भी न सुहाय!!
इक इक ग्यारह होत हैं, कहता सब संसार!
मिल-जुल बोझ उठाय लो, सच यह बानी सार।।
अपनी खिचड़ी अलग से, पका रहे सब लोग!
आरती पूजन साथ ही, लगे ईश को भोग!!
दाल में कुछ काला समझ, अति मीठे जब बोल!
सँभल जाईये पहले ही, अपनी पगडी तोल!!
बन कोल्हू का बैल वो, जुटा रहा दिन रैन!
बस दो रोटी के लिये, जीवन भर ना चैन!!
पाँव जमाये राखिये, जीवन बहती धार!
नदिया की गहराई का, दिखे आर ना पार!!
पाँव झूठ के होय ना, सच दुनिया की बात!
सच्चाई का पुतला भी, करता धोखा-घात!!
मुँह की खाकर भी चला, जो अपनी ही चाल!
बिन मांगे उसको मिले, माटी अपने भाल!!
लगा कोयलों पर मोहर, मोती देत लुटाय!
रे मन अब तो जाग जा, सच्चे धन पहीं धाय!!
बैल बन गया कोल्हू का, झूठी संपदा ठान!
कफन-दौड़ ही मच रही, हाथ से लुटा थान!!
हेमलता मिश्र “मानवी”
नागपुर (महाराष्ट्र)
