बात सिर्फ़ महिला वर्ग की नहीं,
बात उस सत्य के भय की है
जो एक स्त्री के साथ
उसके जन्म से चलना शुरू कर देता है।
उस भय का
कोई धर्म नहीं होता,
कोई जाति नहीं,
कोई सीमा नहीं निर्धारित होती है ।
क्योंकि दरिंदगी
कभी नाम देखकर नहीं आती,
वह सिर्फ़ शरीर देखती है
और एक शरीर के आगे
तथाकथित इंसानियत मर जाती है।
जहां आत्मा मर जाए,
वहां संस्कार,
दीवारों पर लिखे हुए आदर्श,
भाषणों में सजाए गए वाक्य
सिर्फ़ शब्द भर रह जाते हैं ।
दरिंदा, कापुरुष, पापी, नीच …
नाम बदलते रहते हैं,
लेकिन स्त्री के डर का चेहरा
हर बार एक-सा होता है।
वह चेहरा
भीड़ में भी मिलता है,
घर में भी,
सड़क पर भी,
दफ़्तर में भी,
और उन जगहों पर भी
जहां लोग ईश्वर को ढूंढने जाते हैं।
समाज का क्या है
वह आराम से कह देता है
“ये तो हर जगह होता है…”
जैसे किसी स्त्री का डर
कोई अति मामूली घटना हो,
जैसे उसकी चुप्पी
सिर्फ़ एक आदत हो।
शायद इसीलिए
महिला दिवस के दिन भी
बुद्धिजीवी ताना कसते हैं
हंसते हैं, प्रश्न उठाते हैं
संवेदना !!!
प्रायः हर किसी को बोझ लगती है!
दरअसल समस्या स्त्री होने में नहीं,
समस्या उस नज़र में है
जो उसे इंसान कम
और शरीर ज़्यादा समझती है।
जिस दिन
एक स्त्री को देखकर
सबसे पहले उसका मन दिखाई देगा,
उसका अस्तित्व,उसकी थकान,
उसके सपने समझ में आएंगे
शायद उस दिन
समाज सच में सभ्य कहे जाने के योग्य होगा।
(जिसकी संभावना न कभी हुई, न कभी होगी)
-रश्मि प्रभा
