मिले अगर सम्मान तुम्हें तो,
भर ह्रदय स्वीकार करो।
स्नेह, दुलार और ममता का,
आदर व सत्कार करो।
खुश रहो जीवन में औरों से,
सदा सद् व्यवहार करो।
मिले अगर जो अवसर तुम्हें तो,
थोड़ा सा उपकार करो।
धर्म नहीं परहित से बढ़कर,
सेवा और परोपकार करो।
अन्याय को ना सहो कभी तुम,
न्याय की पुकार करो।
ईर्ष्या,द्वेष छल, कपट का,
नहीं तनिक विचार करो।
बनो कर्मठ और कर्तव्य निष्ठ भी,
सत्य सदा ही आचार करो।
मानवता के रक्षक बनो तुम,
दानव का संहार करो।
आचरण में शुद्धता भरकर,
नित्य कर्म सदाचार करो।
धात्री का ऋण ना चुके कभी भी,
बन निर्मल आभार करो।
निज कर्तव्य निभा चित्त से,
जीवन का उद्धार करो।
अमन, चैन की बहे बयार अब,
शांति का प्रचार करो।
राष्ट्र धर्म से बड़ा ना कोई,
भक्ति प्रसार करो।
-मुक्ति भंडारी ‘ममता’
पारा, जिला झाबुआ, (मध्य प्रदेश)
