बचपन गाँव में बीता। आँखें या तो खेतों की सूखी काली मिट्टी देखती थीं या आसमान में उड़ते सफेद बादल।ज़िन्दगी भी तब श्वेत-श्याम थी। सपने रंगीन थे लेकिन सुबह जब आँख खुलती, रंग याद नहीं रहते थे। स्कूल में ब्लेकबोर्ड पर चॉक की सफेदी से लिखे हर्फ़ जरूर कहते थे, रट लिया और समझ लिया मतलब तो जीवन में इंद्रधनुष बनेगा। इंद्रधनुष सतरंगी होता है।
कितने जतन से याद किया था उन सात रंगों को… एक पहियानुमा तख्ती पर उन वर्णों को उसी क्रम में सजाया था जैसे वो आसमान में दिखाई देते थे। पहिये को जोर से घुमाने पर तख्ती सफेद दिखाई देती थी। रंग पता नहीं कहाँ गुम हो जाते थे।
ज़िन्दगी, नीरस और श्वेत-श्याम गाँव से निकलकर शहर के कोलाहल और रंगीनियों में आई लेकिन जीवन के पहिये की रफ़्तार इतनी तेज़ हो जाती थी कि सारे रंग गड्डमड्ड होकर दूर चले जाते और रह जाती वही काली-सफेद परछाईंयों सी ज़िन्दगी…
हर शाम जब सूरज अस्ताचलगामी होता, सुरंगमा के कदम भीगी रेत पर उभरने लगते और वो सागर तट पर सूरज डूबने के नजारे में खो जाती।
दूर पिघलते सूरज से रिसती सुनहरी रश्मियों की बूँदें जब पानी में समातीं, पानी का रंग सुनहरा-रतनारा होने लगता और सुरंगमा उन रंगों को अपलक निहारती रहती।
सागर के सीने पर फैले पानी के कैनवास में टिकते नहीं थे वो रंग ज्यादा देर तक। उधर सूरज ने डुबकी लगाई इधर सारे रंग गायब हो गये।
नीनी लहरों के साथ उफनता सफेद झाग किनारे तक आता और ज़िन्दगी फिर से एकबार श्वेत-श्याम हो जाती।सुरमई अँधेरे दबे पांव दस्तक देने लगते और सारा शहर जगमगा उठता कई तरह की रौशन हो रही बत्तियों से।
लैम्पपोस्ट की रोशनी में कदमों को गिनते हुए सुरंगमा, मंथर गति से बढ़ती जाती घर की तरफ़ जहाँ सन्नाटे और अँधेरे की जुगलबंदी टूटती उसके स्विच पर उँगली रखने से और अतीत की परछाईयाँ उसे घेर लेतीं।
चेहरे पर पानी की बूँदों से समुद्र के खार को धोकर वो किचन में आती और कुछ देर बाद पानी रंग बदलने लगता पत्ती के उबलने से।
गर्म दूध में रंगीन पानी छानते हुए आज फिर दो कप भर दिए थे।
कब तक जारी रहेगी यह बेखुदी। अक्सर एक कप सिंक के हवाले कर आ बैठती है अपना प्याला लेकर बालकनी में जहाँ कोलतार की काली सड़क नहा रही है वाहनों की हेड लाइट से और बजते हॉर्न की कर्कश ध्वनि नीरवता को लीलती जाती है।
काश उसके पास भी ऐसा कोई चीखता हार्न होता जिसे पूरी शिद्दत से बजाकर वो अपने भीतर चीखते सन्नाटों को चुप करा सकती लेकिन, अनिमेष को पुकारते हुए आवाज़ में इतनी सलवटें आ गई हैं सीधी रेखा में पुकार नहीं जाती… पुकारे भी तो टकराकर आवाज़ लौट आती है उसके ही स्वरयंत्र में और अनुनादित नाद से अवरुद्ध हो जाता है कंठ।
कितनी बार चाय तब्दील होती है शर्बत में और वो एक घूँट में गुटक लेती है जैसे चाय नहीं ज़िन्दगी है जिसे ज़हर की तरह उसने हलक में उंडेल दिया है।
वो भी नीलकण्ठ बन गई है। जबतक हलाहल, ठहरा हुआ है गले में उसकी साँसें चल रही हैं। जिस दिन वो ज़हर पेट में उतर गया, जीवन का अंत सुनिश्चित है। इसीलिये वो उस कड़वाहट को न थूक रही है न निगल रही है।
अच्छा लगा था उस दिन आफिस में मिसेज कांता से सुनकर कि वो अकेली नहीं है इस दुख को झेलने वाली। उसकी जैसी अनगिनत सुरंगमाओं के हृदय से टपक रहा है लहू असफल प्रेम का। उनकी अपनी बेटी ने पूरे परिवार को विवश कर दिया था उसकी जिद पूरी करने को। कॉलेज में जो होता है उस आकर्षण में प्रेम सोने में मिली खोट की तरह होता है जो ज़िन्दगी की भट्टी में तपते ही, पिघलकर ऊपर तैर जाता है और रह जाती है खोट जीवनभर के लिए।
गलत नहीं कहा था कांता जी ने।
अनिमेष भी कहाँ सह सका था ताप जिम्मेदारियों का। जब सुना था उसने स्त्री की पूर्णता को प्रमाणित करने का समय आ गया है, जल्दी ही घर में नन्हीं किलकारियाँ गूँजेंगी वो खामोश हो गया था।
गहराती गई थी उसकी खामोशी और सुरंगमा के सपनों के रंग छूटने लगे थे। जिस दिन चैकअप में अनिमेष की मित्र डॉ. शिखा ने इंजेक्शन लगाया था, सारी रात वो दर्द से तड़पती रही थी। उसके जिस्म से बहती खून की हर बूँद में उसकी कोख में पल रही ज़िन्दगी दम तोड़ रही थी। बहुत लम्बी और काली थी वो रात।
सुबह अस्पताल में जब नर्स ने उसके साथ हुए हादसे को बताया तो वो सन्न रह गई थी।
उसके कपड़ों पर जमा खून सुर्ख नहीं था। काला पड़ गया था जैसे फसल बर्बाद होने के बाद खेत की मिट्टी दिखाई देती है… सूखी और काली।
गॉयनोकालजिस्ट ने दुनिया की सारी संवेदनाओं की पोटली में रखकर सौंप दी थी वो रिपोर्ट जिसमें लिखा था वो अब बंजर है। उसकी उर्वराशक्ति उस इंजेक्शन ने खत्म कर दी है जिसे कैल्शियम का कह कर लगाया था।
याद नहीं, पिछले किस सपने को रंगीन देखा था उसने। हमेशा गहरी काली राख से सराबोर सपने दिखाई देते थे उसे।
जिस दिन से मिसेज कांता ने उसे बच्चा गोद लेने के बारे में बताया है, ऐसा लगने लगा है जैसे सपनों के ऊपर जमी काली धूल हट रही है। बचपन वाले उस श्वेत-श्याम बायस्कोप की फिल्म रंगीन होने लगी है।
आफिस के लीगल एडवाईजर मि. सिन्हा ने आश्वस्त किया है कि जिसे वो गोद लेगी, वही बच्चा उसका कानूनी उत्तराधिकारी होगा।
कई बार हम श्वेत-श्याम बायस्कोप में ज़िन्दगी की फिल्म देखते रहते हैं और कोसते हैं रंगों को। कभी ज़िन्दगी के बायस्कोप को बदलकर भी देख लेना चाहिए। हो सकता है ज़िन्दगी इन्द्रधनुषी नज़र आने लगे…
-मुकेश दुबे
