एक अनुत्तर प्रश्न

माँ अक्सर बोला करती थी,
घर से बाहर कम जाना तुम,
और सांझ ढले उससे पहले,
घर के अन्दर आ जाना तुम।
हैं विषधर फैले चहुँ ओर,
जो नजर न तुमको आएंगे,
जब पाएंगे तुमको तन्हा,
वो अपना फन फेलाएंगे।
मैं हस देती थी सुनकर सब,
ये किन सदियों की बाते है,
हैं पढ़े लिखे सब लोग यहाँ,
फिर क्यूं ये सब बतियाते है।
अनपढ, गंवार नहीं अब नारी,
है उसका वर्चस्व यहाँ,
है दुनियां उसकी मुट्ठी में,
है उसका ही सर्वस्व यहाँ।
नारी अब अबला नहीं रही,
अपनी रक्षा कर सकती है,
शक्ति का पर्याय है वह,
नारी कुछ भी कर सकती है।
पर ये बाते तो बस बाते है,
उस दिन मुझको अहसास हुआ
जब राह अकेली जाती थी,
किसी का पीछे आभास हुआ।
थे अनजाने कुछ पुरूष वहाँ,
आँखों में उनकी लालच था,
जीह्वा से लार टपकती थी,
मुझको पाना बस मकसद था।
उस रोज बची अस्मत मेरी,
अहसान प्रभु का माना है,
माँ! तेरा आँचल छोड़ मुझे
कहीं और नहीं अब जाना है।
माँ! क्यों ये दुनियां ऐसी है?
औरत का जीना मुश्किल है,
देवी का जिसमें रूप पला,
उसको ही आखिर क्यूं है छला
लक्ष्मी के रूप में घर लाकर,
क्यों उसे जलाया जाता है,
नवरात्रों में पूजन करते!
और कोख में मारा जाता है।
अपराध पुरुष का होता है,
पर हमको सहना पड़ता है।
कभी पत्थर बनना पड़ता है,
कभी जिन्दा जलना पड़ता है।
कब बदलेगी यह रीत यहाँ,
नारी को नारी समझेंगे,
उसका अपना भी जीवन है,
उसके सपनों को समझेंगे।
माँ की आँखें बस भर आई,
बाहों में मुझको बांध लिया,
सोचा था माँ कुछ बोलेगी,
पर चुप्पी को उत्तर मान लिया।

-गोपेश दशोरा,
उदयपुर (राजस्थान)

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