लगे सजाने वर्तमान को

लगे सजाने वर्तमान को
लेकर फिर
कीचड़ अतीत की
लेकिन जहाँ-जहाँ जायेंगे
संवेदन ही आहत होगा !

कहीं-कहीं
लथपथ पायेंगे
सनी खून से हुई चेतना
कहीं क्रूरता के
प्रकोप में
मिले चीखती हुई वेदना

उत्पीड़न के
साक्ष्य मिलेंगे
अपनापन ही विक्षत होगा !

कहीं उठाकर हाथ
प्रतिज्ञा
नये-नये संकल्प करेगी
उद्घोषों के
महाशोर में
आतंकी हुंकार भरेगी

नियम-विरुद्ध
आचरण कब तक
व्यवहारों में संगत होगा !

कल का बोया
आज कट रहा
अब का बोया कभी कटेगा
यह निश्चित है
परदा सच से
देर-सबेर जरूर हटेगा

जो भी सच के
लिए खड़ा है
साथ उसी के जनमत होगा !

-जगदीश पंकज

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x