शब्द युग्म – “इधर-उधर”
बात को इधर-उधर करना नहीं अच्छा,
ये पाप अपने हिस्से, भरना नहीं अच्छा।
यहाँ बोलने वाले बोलते रहेंगे उम्र भर,
इन बोलने वालों से डरना नहीं अच्छा।
जज़्बात अपने दिल के, बाँधकर रखना,
माला जैसे उनका बिखरना नहीं अच्छा।
जिस रास्ते पे सिर्फ़, इल्ज़ाम मिलते हों,
उस रास्ते से तेरा, गुज़रना नहीं अच्छा।
खुद की जुबान पर मैं क़ायम हूँ हमेशा,
बोली हुई बात से मुकरना नहीं अच्छा।
सच बोल के माफ़ी माँग लेना ‘समन्दर’,
झूठ बोल दिल से उतरना नहीं अच्छा।
-गोपेश दशोरा,
उदयपुर (राजस्थान)
