“स्वानुभूति”
2212/2212/2212/22
जब तक हमारी जिन्दगी, कुछ कर लिया जाए।
मन के मुताबिक एक दुनिया गढ़ लिया जाए।।
क्यूँ आदमी लड़ता रहा है मजहबी बनकर?
कारण यहाँ जो हो, उसे अब पढ़ लिया जाए।।
यूँ बेवजह जाती रही जानें किसी की है।
दुनिया बचाने लोग सबसे मिल लिया जाए।।
मिलकर रहेंगे, खूबसूरत जिन्दगी होगी।
यूँ मजहबी भी चाहते क्या सुन लिया जाए।।
आपस में लड़ने से हमें मिलता नहीं कुछ भी।
बातें यही वो काम की है, कह लिया जाए।।
स्वानुभूति मेरी दे रही है सबक मुझको।
शैतान कौन यहाँ, उसी का सुध लिया जाए।।
-अजय पाण्डेय बेबस
