“स्वानुभूति”
माया के आधीन था मन
काया को ही सर्वस्व जाना,
दर्पण से इतर ना स्वयं को पहचाना,
खुशी मिली तो हर्षाये,
दर्द मिला तो दुखी हुए,
इससे परे भी है कुछ
समझ ना पाये,
अनन्त यात्रा है जीवन हम है अनन्त यात्री,
सजा है रंगमंच
हम अपना किरदार निभाते हैं,
जीते हैं अपना हिस्सा चले जाते हैं,
जब देह भी अपनी नहीं
तो परिचय क्या है मेरा,
ब्रह्माण्ड का विशिष्ट अंग मैं, भूला अपना सच,
माया के मोह के धागे
नित कसते जाते हैं,
स्व से दूर हम यहां बसते जाते हैं,
दर्पण में दिखता अक्श ही सच लगने लगता है,
आँखों के आगे ही सच था,भ्रमित मन कभी जान ना पाया,
धीरे-धीरे खुद के भीतर
स्वानुभूति को पाया,
आत्मबल
आत्मबोध
आत्मविश्वास से खुद को लवरेज किया,
बदल गया जीने का ढंग
-नमिता दुबे मिशा
