जिंदगी का ताना-बाना,
बुनता रहा जिंदगी भर,
जिंदगी है एक पहेली,
सुलझाता रहा जिंदगी भर।।
खूब हाथ-पैर मारे
उत्तर एक न मिला,
मकड़जाल सा देखो तो,
फँसता रहा जिंदगी भर।।
कभी खुशी कभी गम की,
दो डोरों के बीच में,
कठपुतली के जैसे मैं,
नाचता रहा जिंदगी भर।।
जिंदगी की कश्ती को,
किनारा भी न मिला,
साहिल की तलाश में,
घूमता रहा जिंदगी भर।।
अपनी इस जिंदगी में,
कैसे खुशियां भरूँ,
इसी उधेड़बुन में फिर,
फिरता रहा जिंदगी भर।।
मन की तर॔ग को,
पतंग सा बना दिया,
मन की स्वानुभूति को,
विसराता रहा जिंदगी भर।।
-साधना छिरोल्या
